Sunday, 1 January 2012

स्त्री की मर्मान्तक चीख



स्त्री चाहें कितनी भी आधुनिक,हॉट,बिंदास और मशहूर हो जाए,उसके भीतर की पुरातन स्त्री कभी नहीं मरती |वह पुरातन स्त्री,जो सच्चा प्रेम चाहती है |अपना घर-संसार चाहती है और यहीं वह मात खा जाती है,क्योंकि समाज का संस्कार और पुरूष की मानसिकता ऐसी नहीं है कि बिंदास-बोल्ड स्त्री को प्यार व सम्मान दे सके|उसके लिए वह बस मन-बहलाव का साधन-मात्र होती है |शायद ही कोई ऐसा पुरूष मिले,जो बदनाम स्त्री को सहर्ष अपनाये और समाज में उसे लेकर गर्व के साथ  चल सके |अगर विरले कोई पुरूष ऐसा करता भी है,तो समाज इस कदर उसके पीछे पड़ जाता है कि वह पुरूष डिप्रेशन में चला जाता है या पीछे हट जाता है |इस सम्बन्ध में प्रेमचन्द की कहानी ‘आगापीछा’को देख सकते हैं |इस कहानी में जाति का हरिजन एक युवक वेश्या के प्रेम में पड़ जाता है और उससे विवाह करना चाहता है,पर स्थिति ऐसी बनती है कि उसे इतना आगा-पीछा सोचना पड़ता है कि उसे सन्निपात हो जाता है |वेश्या हतप्रभ रह जाती है कि कैसा है यह समाज,जो उसके पैरों पर लोट सकता है,पर इज्जत की जिंदगी जीने नहीं देना चाहता ?यह सच है कि समाज ऐसी स्त्री को सम्मान नहीं देता,जो उसके द्वारा तय मानदंडों पर खरा नहीं उतरती |ऐसी स्त्री को तब-तक तो कोई विशेष फर्क नहीं पड़ता,जब तक वह युवा तथा बुलंदी पर होती है और समाज की परवाह नहीं करती,पर ज्यों ही वह उम्र व कामयाबी के ढलान पर आती है,समाज अपना भरपूर बदला लेता है |इसी कारण वेश्याएं या बिगड़ी कही जाने वाली स्त्रियाँ बुलंदी पर रहते ही अपनी आर्थिक स्थिति को इतनी मजबूत कर लेती थीं,कि ढलान पर उन्हें किसी का मुहताज न होना पड़े |चमकदार फ़िल्मी दुनिया की कहानी भी इससे अलग नहीं है |वहाँ भी कई नायिकाओं को अपनी ढलान पर ऐसे ही दारूण यथार्थ का सामना करना पड़ता है| आज भी फ़िल्मी-दुनिया के जगमग उजालों के पीछे कई थरथराते,उदास और गर्दिश में डूबे चेहरे हैं,जिन्हें आज कोई नहीं पूछता|एक समय इनकी तूती बोलती थी | इनमें समझदार नायिकाओं ने तो अपनी जिंदगी से समझौता कर लिया,पर जो नहीं कर पाई,उनका अंत बड़ा ही दुखद रहा |उनकी दास्तान बड़ी ही मार्मिक है |इन्हीं मार्मिक दास्तानों में एक दास्तान ‘सिल्क स्मिता’की भी है |दक्षिण-भारतीय अभिनेत्री ‘विजय-लक्ष्मी’,जो पहले‘स्मिता’फिर 'सिल्क स्मिता' कहलाई,अस्सी के दशक की स्वतंत्र स्त्री थी |बेहद बोल्ड,बिंदास,हॉट,सेंसुअलिटी की रानी |उसने अपनी देह के बल पर एक्स्ट्रा से‘मोस्टवांटेड’अभिनेत्री का सफर तय किया,पर उसे इसकी भरपूर कीमत चुकानी पड़ी |वह आज का समय नहीं था,जब लड़कियाँ अपने जीवन के बारे में खुली हुई हैं और जो कुछ करती हैं,उस पर गर्व करती हैं |उनके कपड़े भी उस तरह आलोचना के विषय नहीं हैं और अगर है भी,तो वे उसकी परवाह नहीं करतीं | सिल्क समय से पूर्व पैदा हो गयी स्त्री थी,इसलिए उसे ज्यादा बोल्ड कहा गया |उसके कपड़े भी बोल्ड माने गए,जबकि उसकी बिकनी,साड़ी,हॉट पैंट और बुनाई वाले ब्लाउज सब कुछ उस दौर की स्त्रियों को खूब पसंद आईं थीं |सिल्क से ही दक्षिण-भारतीय अभिनेत्रियों को'लो वेस्ट साड़ी’पहनने की प्रेरणा मिली थी |फैशन की दुनिया को उसने अपनी कल्पनाओं से खूब समृद्ध किया |दर्शकों को नया सौंदर्य-बोध भी सिल्क से मिला |वह गोरी-छरहरी नहीं थी|आज की हीरोइनों सा जीरो फीगर उसके पास नहीं था |उसका सौंदर्य आम स्त्री जैसा था |यही कारण है कि आम भारतीय स्त्रियों में वह मर्दों से ज्यादा लोकप्रिय थी |अपने देशी यौवन से उसने जिस मांसलता व मादकता का परिचय दिया,वह अद्भुत था |मादकता के नए बिम्बों को उसने जिस तरह आकार दिया,वैसा हिंदी-सिनेमा में भी बहुत कम अभिनेत्रियों ने जीवंत किया था | एक और खास बात उसमें यह थी कि उसने आम भारतीय स्त्रियों की बरसों से दबी-कुचली दैहिक संतुष्टि की इच्छाओं को पर्दे पर जीवंत कर दिया |उसने उन भावनाओं को पर्दे पर जीने की कोशिश की,जिसकी झलक सिर्फ खजुराहों की मूर्ति-शिल्प में देखने को मिलती है |सिल्क सिर्फ पर्दे पर ही नहीं,बल्कि जीवन में भी उतनी ही बोल्ड,निर्भय व जीवंत थी |वह जिंदगी को भरपूर जीने में विश्वास करती थी |उसके अनुसार जिंदगी एक ही बार मिलती है |ऐसी सोच,ऐसा जीवन कोई अपराध नहीं,फिर क्यों सिल्क अपने जीवन-काल में वह सम्मान नहीं पा सकीं ?यह जानने के लिए हमें बीस वर्ष से भी पीछे जाना पड़ेगा|निश्चित रूप से उस समय का समाज स्त्री के मामले में और भी ‘बंद’रहा होगा |स्त्री की उन्मुक्तता अपराध से कम नहीं होगा |ऐसे समय ने समय से पूर्व पैदा हो गयी सिल्क को खराब स्त्री मान लिया,क्योंकि उसके पास मादक यौवन था,उसकी अदाओं में शराफत नहीं थी,ना ही उसकी आँखें शर्म से झुकती थीं|उसे ना तो द्विअर्थी व बोल्ड संवाद बोलने में हिचक थी,ना बोल्ड सीन देने में |भला ऐसी स्त्री को दोहरी जिंदगी जीने वाला दोमुंहा समाज कैसे स्वीकार कर सकता था?
ऐसा नहीं कि सिल्क को लोकप्रियता नहीं मिली |१९८० से १९८३ तक उसकी लोकप्रियता का यह आलम था कि लीक से हटकर फ़िल्में बनाने वाले ‘बालू महेंद्रा’और ‘भारतीय राजा’को भी उसे काम देने पर मजबूर हो पड़ा |बालू महेंद्रा ने सिल्क को ‘मूरनम पिराई’ में खास रोल दिया था |’सदमा’में फिर उसे रिपीट किया |मसाला फ़िल्में तो मानों उसके बिना चलती ही नहीं थीं |अच्छे-अच्छे निर्माता अपनी फिल्म में उनका एक गाना जरूर रखते थे |कई तो सिल्क के गाने की प्रतीक्षा में अपने फिल्म का प्रदर्शन रोके रहते |हिंदी-निर्माताओं ने भी उनकी लोकप्रियता को भुनाया |सिल्क को फिल्मों में पहला ब्रेक १९८० में ‘वाडी चक्रम’से मिला था,फिर वह नहीं रूकी |अपने दस साल के कैरियर में उसने पांच-सौ फ़िल्में की और ग्लैमर के आसमान की चाँद बनने का उसका सपना पूरा हुआ |कौन जानता था कि आन्ध्रप्रदेश के ‘राजमुंदरी केएल्लुरू’में २ सितम्बर १९६० को बेहद गरीब परिवार में जन्मी वह एक दिन स्टारों की बेहतरीन जिंदगी जी पाएंगी |उनके माता-पिता इतने गरीब थे कि चौथी कक्षा के बाद उसे सरकारी स्कूल भी नहीं भेज पाए थे |पहला काम भी उसे फिल्मों में ‘मेकअप असिस्टेंट’का मिला,जहाँ से उसके सपनों ने उड़ान भरी थी |उसकी सफलता के पीछे उसकी कड़ी मेहनत थी |उसने तीन-तीन शिफ्टों में काम किया और एक-एक गाने के पचास-पचास हजार तक पारिश्रमिक लिया,पर अपने शोहरत के उस दौर में  वह अपने निजी जीवन को संतुलित नहीं रख सकी |इस भूल की कीमत उसे अपने कैरियर के ढलान पर आते ही चुकानी पड़ी |जिंदगी में उसे लगातार छल-कपट,धोखेबाजी का सामना करना पड़ रहा था,जिसके कारण मनोवैज्ञानिक रूप से कमजोर पड़ती गयी |एक करीबी मित्र ने उसे फिल्म-निर्माता बनने का लालच भी दिया,पर दो फिल्मों के निर्माण में ही उसे दो करोड़ का घाटा हो गया |तीसरी फिल्म शुरू तो हुई,पर पूरी ना हो सकी |बैंक में निरंतर रकम कम हो रही थी,उसपर उसे काम भी नहीं मिल पा रहा था |स्टार की जीवन-शैली भी खर्चीली ही होती है |इन सब दवाबों ने उसके मानसिक संतुलन को हिला दिया |२३ सितम्बर १९९६ को उसकी लाश उसके घर के पंखे से झूलती मिली थी,जिसे आत्महत्या का केस मानकर पुलिस ने उसकी फाईल बंद कर दी | इस तरह एक बोल्ड स्त्री का दुखद अंत हुआ और आम स्त्री ने सोच लिया कि पारम्परिक स्त्री बने रहने में ही भलाई है,भले ही परम्परा के पिंजरे में दम घुट जाए |कम से कम ऐसे मरने से सम्मान तो मिलेगा,जो सिल्क जैसी स्त्रियों को कभी नहीं मिलता |
बीस वर्ष के बाद सिल्क ‘द डर्टी पिक्चर’के माध्यम से फिर चर्चा का विषय बनी है |जितने मुँह उतनी बात | सहानुभूति कम थुक्का-फजीहत ज्यादा है |’देह की आजादी’,‘स्त्री-विमर्श’के इस समय में सिल्क की तरफ उठती अंगुलियाँ बता देती हैं कि बीस वर्ष पूर्व सिल्क के प्रति लोगों की क्या धारणा रही होगी?क्यों उसे प्यार व सम्मान नहीं मिला?क्यों वह टूट गयी ? इस फिल्म ने एक बार फिर ‘देह’के बारे में सोचने पर विवश कर दिया है |प्राचीन काल से ही देह स्त्री का हथियार रहा है,पर यह कैसा हथियार है,जो अंततःउसे ही लहुलूहान करता है |देह के माध्यम से पाई सफलता कितनी क्षणिक साबित होती है |ना तो इस सफलता से सम्मान मिलता है,ना इसमें स्थायित्व होता है |यह सब जानने के बाद भी स्त्रियाँ ‘देह’ बनने को क्यों ब्याकुल हैं ?सिल्क यदि ‘दिमाग’के कारण जानी जाती,तो क्या उसका अंत इतना ही भयावह होता ?विज्ञापन,फिल्में व बाजार स्त्री की देह का मनमाना इस्तेमाल करके उससे लाभ कमाता है और जब चाहे उठाकर बाहर फेंक देता है |स्त्री की अस्मिता उसके अस्तित्व पर कितना बड़ा खतरा है ये !इसके बावजूद आज की स्त्री सौंदर्य को टिकाऊ बनाने के पीछे इतनी पागल है कि ‘दिमाग’बनने की दिशा में कुछ सोच ही नहीं रही |सिल्क की विवशता तो एक बार समझी भी जा सकती है कि चौथी पास,साधारण रूप-रंग की लड़की के पास देह-प्रदर्शन के अलावा कोई चारा नहीं था |ग्लैमर का चाँद बनने और स्टार की तरह जीवन जीने की आकांक्षा ने उसे आत्मा को मारकर समझौते की राह दिखाई,पर समर्थ अभिनेत्रियों को क्या हुआ है,जो देह उघाड़कर फिल्म-निर्माताओं की दुकान चला रही हैं ?सिल्क की जिंदगी को भी फ़िल्मी-बाजार ने भुनाया,अब उसकी मौत को भी भुना रही है |यह विडम्बना नहीं तो और क्या है कि ज्यादातर लोग फिल्म के अश्लील डांस,गाने व दोहरे सम्वाद देखने-सुनने जा रहे हैं|सिल्क की ट्रेजडी लोगों को सही जगह छू भी नहीं रही है,ना ही उसकी मर्मान्तक चीख किसी को सुनाई पड़ रही है |ऐसा होता तो शायद समाज की मानसिकता में बदलाव की उम्मीद भी बंधती |सिल्क का दुखद अंत समाज के सामने एक प्रश्न है,तो देह को हथियार समझने वाली स्त्रियों के लिए एक सबक भी! फिल्म की सिल्क का एक प्रश्न आज भी उत्तर की प्रतीक्षा में है कि –‘जो डर्टी फिल्म बनाते,बेचते व देखते हैं,जब वे इज्जतदार माने जाते तो उसमे काम करने वाली अभिनेत्री क्यों गलत मानी जाती है?’स्त्री को हमेशा उपभोग की सामग्री माना गया |उसे बेचा-खरीदा गया |मनोरंजन की चीज बनाकर पेश किया गया,उपर से बदनाम भी किया गया |आज स्त्री को इसके खिलाफ खड़ा होना पड़ेगा,वरना सिल्क-स्मिताएं बनती रहेंगी और असमय मरती रहेंगी |

4 comments:

  1. उत्तम आलेख ...

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  2. great bahut accha likha ranjna jee apne

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  3. "विज्ञापन,फिल्में व बाजार स्त्री की देह का मनमाना इस्तेमाल करके उससे लाभ कमाता है और जब चाहे उठाकर बाहर फेंक देता है| स्त्री की अस्मिता उसके अस्तित्व पर कितना बड़ा खतरा है ये! इसके बावजूद आज की स्त्री सौंदर्य को टिकाऊ बनाने के पीछे इतनी पागल है कि ‘दिमाग’ बनने की दिशा में कुछ सोच ही नहीं रही| सिल्क की विवशता तो एक बार समझी भी जा सकती है कि चौथी पास,साधारण रूप-रंग की लड़की के पास देह-प्रदर्शन के अलावा कोई चारा नहीं था | ग्लैमर का चाँद बनने और स्टार की तरह जीवन जीने की आकांक्षा ने उसे आत्मा को मारकर समझौते की राह दिखाई,पर समर्थ अभिनेत्रियों को क्या हुआ है,जो देह उघाड़कर फिल्म-निर्माताओं की दुकान चला रही हैं?" उत्तम आलेख के लिए बधाई।

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