Friday, 11 August 2017

यह खाला का घर नहीं है


कोई कुछ भी कहे, हमारा देश महान तो है ही। जरा आप ही सोचिए-इस संसार में है कोई ऐसा देश, जहाँ देवी-देवताओं की संख्या उतनी ही हो, जितनी योनियाँ। यानी चौरासी लाख। इतना ही क्यों कुछ वर्ष पूर्व इस देश की आबादी भी तो तकरीबन उतनी ही थी। यानी एक आदमी के हिस्से एक देवी या देवता। वाह, कितना अच्छा हिसाब था... ! इंसाफ था! आप कह सकते हैं कि अब तो जनसंख्या बहुत बढ़ गई है फिर, तो जनाब, आप क्या समझते हैं, लोग बढ़े हैं, तो क्या देवी-देवता नहीं बढ़े हैं। अब तो कई बाबा और माई लोग भी हैं। पच्चीस साल पहले जितने देवी-देवता नहीं थे, उतने टीले हर जलाशय, घाटों या कॉलोनियों के पार्कों में दिख जाएंगे। विश्वास नहीं होता, तो चलिये अपने शहर के ही कुछ देवी-देवताओं और बाबाओं के साथ टीलों की गिनती करा देती हूँ। कुछ इसलिए कि पूरी न तो मैं गिन सकी हूँ, न आप गिन पाएंगे।
मेरे शहर का नाम जिस बाबा के नाम पर है, उनके मंदिर से करीब एक किलोमीटर की दूरी पर चिरकुटहा बाबा का स्थान है, जिन्हें प्रसाद की जगह चिरकुट (रंग-बिरंगे कपड़ों की कतरन) चढ़ाने की परम्परा है। एक पुराना पेड़ है-जिस पर चिरकुट लटकते रहते हैं। अब इस बाबा का उल्लेख किसी धर्म-ग्रंथ में तो है नहीं, पर वे हैं-इससे कौन इंकार कर सकता हैं? एक और बाबा रेलवे स्टेशन के करीब विराजमान हैं, जिन्हें लाटरी बाबा के नाम से जाना जाता है। इस बाबा का जन्म तब हुआ था, जब लाटरी का सनक की हद तक फैशन था। उस स्थान पर जुआरी एकत्र होते और लकी नम्बर का गणित बैठते। तब न तो घर-घर में फोन था, न हाथ-हाथ मोबाइल। पी सी ओ से बड़ी मुश्किल से बाहर से लकी नम्बर का पता लगता। नंबर का पता चलते ही लाटरी के सभी स्टालों से उस नम्बर का टिकट उठा लिया जाता और फिर उसकी बोली लगाई जाती। यदि नम्बर लग गया, तो लाटरी बाबा की जय से आस-पास गूँज उठता। यह संयोग कहिए या चमत्कार अक्सर नम्बर लग ही जाते, जिसे लाटरी बाबा की कृपा मानी जाती। अब लाटरी का मार्केट डाउन हो जाने के कारण लाटरी बाबा का महत्व थोड़ा कम हो गया है। नक्को बाबा, खाकी बाबा और जाने किन-किन बाबाओं के मजार व मंदिर शहर के चप्पे-चप्पे में विद्यमान हैं। तरंग क्रासिंग, गोलघर, धर्मशाला जैसे भीड़-भाड़ वाले इलाके और चौराहे भी इनसे वंचित नहीं है। बाबाओं के साथ-साथ कई माइयाँ भी हैं। पुराने देवी-देवताओं के मन्दिर भी बन रहे हैं, साथ ही मजारें भी। विश्वविद्यालय रोड पर अयोध्या कांड के बाद सरकारी जमीन के बड़े हिस्से पर मन्दिर निर्माण कर दिया गया है। धर्मशाला पुल के नीचे और असुरन चौराहे के पहले सड़क के एक बड़े हिस्से पर एक पुजारी ने भगवान शंकर को इस प्रकार त्रिशूल थमाकर खड़ा कर दिया है कि प्रतिदिन आवागमन बाधित होता हैं, पर क्या मजाल नगर निगम हस्तक्षेप करे। भई, विध्वंसकारी शंकर का मामला है, कहीं उनका त्रिशूल घूम गया, तो विघ्नकारी के सिर पर बकरे का सिर लगा होगा और वह में5 में5 में5 कर रहा होगा। इन सभी मंदिरों व मजारों पर शाम ढले नशेड़ियों, जुआरियों, जेबकतरों,उचक्कों का जमघट तो लगता ही है, विश्वविद्यालय के बिगड़े छात्रनेता और कुछ पुलिस वाले भी आ जुटते हैं और फिर सुरती , भांग, अफीम, चरस, हेरोइन का वह सुट्टा लगता है कि पूरा वातावरण ही नशीला हो जाता है। क्या मजाल की कोई शरीफ आदमी सपरिवार उधर से गुजरने की हिम्मत जुटा पाए।
एक राज की बात और बताऊँ। ये जो सारे निर्माण कार्य हुए हैं, या हो रहे हैं। वे या तो सरकारी जमीन पर हो रहे हैं या फिर दुश्मन की खाली पड़ी जमीन पर। इन बाबाओं व देवी-देवताओं को भक्त अपने घर या उसके दुश्मन अपने आगे-पीछे जगह नहीं देते, क्योंकि फिर वह मजा नहीं रह जाता। दुश्मन को परास्त करने का इससे अच्छा मौका भी कहाँ मिलता है? तो जनाब, हमारे पूरब में तो यही रिवाज है कि सरकारी या दुश्मन की जमीन पर धार्मिक निर्माण किए जाएँ, वह भी पक्का और सारे धार्मिक कृत्य भी वहीं किए जाएँ, क्योंकि इससे दुश्मन इस तरह घायल होता है कि मरने के बाद भी उसकी आत्मा छटपटाती रहती है, आखिर मामला धर्म का होता है- जिसके नाम पर तो इस देश में कुछ भी किया जा सकता है। आप सोच रहे होंगे कि कहानी लिखने की जगह मैं ये क्या किस्से लेकर बैठ गई हूँ। धैर्य रखिए, मेरी कहानी का इन किस्सों से गहरा रिश्ता है।
तो चलिये कहानी शुरू करते हैं। कहानी एक पाश कॉलोनी की है, जहाँ इस समय सौंदर्यीकरण की योजना पर तेजी से काम चल रहा है, पर मामला वहाँ के पार्कों पर लटक गया है। कॉलोनी में कई पार्क हैं-जिसे बच्चों के खेलने व बड़ों के खाली समय में टहलने-घूमने के उद्देश्य से बनवाया गया होगा। पर मुसीबत यह है कि न तो बच्चे वहाँ खेल सकते हैं, न वहाँ उठा-बैठा या घूमा जा सकता है। कारण यह है कि कॉलोनी में पहले-पहले बसने वालों ने (अपने सामने के नहीं) अगल-बगल के पार्कों में कुछ टीले-सा बनवा दिया और पार्क के बीचो-बीच लंबा-चौड़ा तलाबनुमा गड्ढा खुदवा दिया है। जो बाकी दिनों में तो मिट्टी से भर दिया जाता है, पर साल में एक बार उस मिट्टी को हटवाकर उसमें पानी भरा जाता है। पार्क की सफाई होती है (बाकी दिन तो पार्क छुट्टा पशुओं का सुलभ शौचालय होता है)पार्क के चारों तरफ झालरें लगाई जाती हैं। ला उडस्पीकर पर मंगल गीत बजते हैं। अब तक आप समझ गए होंगे कि मैं किस उत्सव की बात कर रही हूँ, बिलकुल ठीक समझे आप, यह वही उत्सव है, जिसको लेकर महाराष्ट्र व बिहार में ठन गई थी । यू॰पी॰ को भी इसका खामियाजा भुगतना पड़ा। जी हाँ, छठ पर्व। वैसे तो छठ विशुद्ध व्यक्तिगत कल्याण का पर्व है, जो मुख्यत: पुत्र की कामना व उसकी सुरक्षा के लिए किया जाता है पर व्यक्तिगत जमीन में उसका कोई स्थान नहीं है। छठ देवी को घर में या घर के आगे-पीछे की जमीन पर जगह नहीं दी जाती। उनकी स्थापना के लिए भी सरकारी या दुश्मन की जमीन का उपयोग करने की परम्परा है। सो पार्कों में छठ माता के पक्के टीले हैं, जब भी व्रत करने वालों की कोई मनोकामना पूरी होती है। टीलों की संख्या बढ़ जाती है। शहर के सारे जलाशय, व नदी के घाट ही नहीं, पार्क व खाली पड़ी ज़मीनों पर छठ माता के इतने टीले बन गए हैं कि उनकी गिनती मुश्किल हो गई है।
एक बात और बता दूँ की कुछेक साल पहले इस शहर में छठ पर्व नहीं होता था, यह तो मुख्यत: बिहार का ही पर्व माना जाता था, जब बिहार से धनाढ्य लोग इस शहर में आकर बसने लगे, तो उनके कन्धों पर सवार होकर छठ माता भी आ गईं। ये धनाढ्य लोग भले ही काम बिहार में करते रहे, पर उनके मकानों और महलों से यह शहर भर गया। साथ ही भर गईं (छठ माता के टीलों से) खाली पड़ी सरकारी व व्यक्तिगत ज़मीनें। तो छठ माता ने जो जगहें अपने लिए चुन लीं (या सायास बैठा दी गई) तो चुन लीं। अब किसकी मजाल, जो उन्हें वहाँ से हटाए?आखिर धर्म का मामला है| उस पर छठ माई बड़ी क्रोधी स्वभाव वाली देवी हैं। जरा- सी चूक को भी नहीं बख्शतीं, सीधे पुत्र हानि करती हैं। सो वे लोग-जिनकी जमीन पर वे क़ाबिज़ हैं, तड़प रहे हैं... करें तो क्या करें! सरकार की भी इतनी हिम्मत नहीं कि इस धार्मिक मसले में हस्तक्षेप करे।
तो हमारी कहानी की कॉलोनी में इस समय आन्दोलन-सा छिड़ा हुआ है। एक तरफ वे लोग हैं-जो प्रगतिशील हैं, जागरूक हैं, अपने अधिकारों को पहचानते हैं। उनका कहना है की उनके सामने के पार्क से छठ माता के टीलों को हटा दिया जाए और उन लोगों के सामने के पार्क में स्थापित करा दिया जाए- जो उस पर्व को करते हैं या जिन्होंने इन लोगों के पार्क में उन्हे स्थापित किया था । इन लोगों का ये भी कहना है की जब हमने कॉलोनी के सुंदरीकरण के लिए लाखों रुपये का बजट पास करा लिया है, तो पार्कों का भी सुंदरीकरण किया जाए और यह तब तक सम्भव नहीं, जब तक ये टीले हटा न दिये जाएँ और गड्ढा स्थायी रूप से भर न दिया जाए। दूसरी तरफ छठ माता के वे भक्त हैं, जिन्होंने इन टीलों का निर्माण कराया था और प्रतिवर्ष भव्य आयोजन कराते हैं। इनके अगुवा तीन लोग हैं। पहले हैं श्रीराम त्रिपाठी- आप रेलवे प्रिंटिंग प्रेस में हैं और लाखों के न्यारे-वारे करने में माहिर हैं। दूसरे हैं-देवी सिंह-आप नगर निगम के टैक्स विभाग में हैं। दो विवाह हो चुके हैं पर बाल एक भी सफ़ेद नहीं देखा गया (राज की बात है) एक हार्ट-अटैक झेल चुके हैं- दूसरी पत्नी के साथ चलते हैं, तो लोग अक्सर पिता-पुत्री समझ लेते हैं-जिसके कारण कइयों से गाली-गलौज, मार-पीट तक कर चुके हैं |तीसरे महाशय हैं-नगेंद्र श्रीवास्तव, ये मार्केटिंग विभाग में इंस्पेक्टर हैं। वैसे तो इनका कार्यक्षेत्र दूसरे शहर में हैं, पर ज्यादा समय घर पर ही बिताते हैं। हाँ, जब सरकारी समर्थन मूल्य पर अनाज खरीद का मौसम आता है, तो उनका चेहरा खिल उठता है। अब खरीद का लक्ष्य पूरा हो या न हो, बिचौलियों की कृपा से इनके परिवार का लक्ष्य जरूर पूरा हो जाता है। ये तीनों महाशय इतनी तेजी से फले-फूले हैं कि सबको आश्चर्य होता है, पर ये उसे छठ माता की कृपा का नाम देते हैं और हर वर्ष छठोत्सव उत्साह से सम्पन्न कराते हैं।
पहली तरफ के लोगों की अगुवाई कर रहे हैं। आनंद बाबू-जो एक मान्य अखबार के पत्रकार है। यद्यपि उनके सोर्स भी कम नहीं हैं। पुलिस और प्रशासन उनकी बात सुन सकता है, पर मामला धर्म का आ ठहरता है, सो इस मामले में वे खुद को असहाय पा रहे हैं, वैसे आनन्द बाबू भी बड़े पुजारी हैं। घंटों पूजा-पाठ करते हैं, पर अपने घर में बने मन्दिर में। उनकी सीधी-सादी पत्नी प रेशान है कि वे क्यों कॉलोनी के मामले में जरूरत से ज्यादा दखल दे रहे हैं; पर न्याय के लिए पत्रकारिता करने वाले आनन्द बाबू अपने पर किया जाने वाला अन्याय सहन नहीं कर पा रहे हैं |आज छुट्टी का दिन था और आनंद बाबू सुबह से कॉलोनी में घूम रहे हैं। उनके लौटते ही पत्नी उनपर बरस पड़ती हैं।
’’एक दिन छुट्टी मिली, तो भी आपको न घर की फिक्र है न मेरी।“
‘’अरे, नाराज क्यों हो रही हो, कॉलोनी वालों से सलाह-मशवरा कर रहा था कि पार्क के मामले में क्या किया जाए।“””””’’
‘’आखिर, आप उस पार्क के पीछे क्यों पड़े हैं। देवी-देवता के मामले में दखल देना ठीक नहीं। कुछ हो-हवा गया तो... ।’’
‘’क्या बेवकूफी की बात करती हो, हम कब देवी का अपमान कर रहे हैं। बस उनका स्थान बदलना चाहते हैं। हम सभी अभी पुजारी के पास समाधान पूछने गए थे। धर्म का काट धर्म ही हो सकता है न। ’’
‘’क्या समाधान मिला?’’
‘’हाँ, मिला न। पुजारी ने बताया, जिसने स्थापना किया था, वही उनकी दूसरी जगह पुनर्स्थापना कर सकता है, चाहे तो विसर्जन भी। ऐसा धार्मिक विधान है।’’
‘’पर वे लोग मानेंगे क्या।’’ पत्नी ने आशंका जताई।
‘’इसी सिलसिले में हम लोग बात करने 2.00 बजे देवी सिंह के घर जाएंगे। नगेंद्र तो हैं नहीं। राम त्रिपाठी भी देवी सिंह के पास आ जाएंगे। देखें, क्या होता है ? बातचीत से मसला सुलझ जाए तो अच्छा है।’’
पत्नी लंबी सांस लेकर घर के काम में लग गई और आनन्द बाबू नहाने के लिए स्नानघर में  घुस गए।
दो बजे आनन्द बाबू अपनी तरफ के शान्त, समझदार लोगों को लेकर देवी सिंह के घर पहुँचे। देवी सिंह ने उन लोगों का स्वागत किया, पर राम त्रिपाठी किसी काम का बहाना करके वहाँ नहीं पहुँचे। आनन्द बाबू और देवी सिंह में बातचीत होने लगी।
‘’देखिए महोदय, मैं भी भक्त हूँ, पर ऐसे धर्म को नहीं मानता, जो दूसरों को कष्ट दे। हम पड़ोसी हैं, हमारा जीवनभर का साथ है। हमें एक-दूसरे की भावनाओं की कद्र करनी होगी।’’
देवी सिंह ने कहा-‘’बिल्कुल सही, मैं भी इसी विचारधारा का हूँ। पर धर्म के मामले में हस्तक्षेप स्वीकार नहीं करता।’’
‘’आप धर्म किसे मानते हैं ? धर्म का अर्थ है-धारण करना। मेरा तो यह मानना है कि जो मनुष्यता को धारण करता है –वही धर्म है |’’
‘’तो क्या हम मनुष्यता के खिलाफ कोई काम कर रहे हैं ?’’
‘’नहीं, मेरे कहने का यह मतलब नहीं, पर आप जानते हैं पार्क में बने टीलों से कॉलोनी वालों को कितनी परेशानी हो रही है।’’
 ‘’अरे भाई, परेशानी की क्या बात है! किसी को बैठना या टहलना है तो, हमारे सामने के पार्क मे आ जाए। हमने माना तो नहीं किया है न।‘’
आनन्द बाबू समझ रहे थे कि घुटे हुए आदमी से पाला पड़ा है फिर भी कोशिश किए जा रहे थे। वे बोले-‘’देखिये महाशय, बच्चों को खेलने के लिए जगह कम पड़ रही है। आजकल क्रिकेट का जमाना है-जिसमें टीले और गड्ढ़े बाधक बन रहे हैं । क्यों नहीं देवी को आप अपने पार्क या अपने आस-पास के खाली स्थान में जगह दे देते हैं।‘’
देवी सिंह हाथ चमकाकर बोले-‘’वाह! आनन्द बाबू, आप भी बहुत इंसाफ बतिया रहे हैं। हमारे पार्क में तो देश-विदेश से लाकर फूल-पौधे लगाए गए हैं, विदेशी घास है। बैठने के लिए पत्थर के बेंच हैं। एक तरफ बैंडमिंटन कोर्ट बना है। अब वहाँ टीले कैसे बन सकते हैं? बच्चों से कहिए अपने घर से बाहर की सड़क पर खेलें। वैसे बच्चों को पढ़ना-लिखना चाहिए, वीडियो गेम खेलना चाहिए। क्या बेकार क्रिकेट वगैरह!’’
आनन्द बाबू का चेहरा तमतमा गया, पर जब्त कर गए। देवी सिंह को बाकी लोगों ने भी काफी समझाया-बुझाया, तब कहीं देवी सिंह को लगा कि इन लोगों की माँग गलत नहीं है। ऐसा लगा की बात बन जाएगी। आनन्द बाबू ने वह कागज निकाला। जिस पर लिखा था कि- पार्क के टीलों को हटाने में उनकी समहति है। माहौल ऐसा बन गया कि देवी सिंह कागज पर हस्ताक्षर कर देते पर तभी उनका मोबाइल बज उठा-उधर से कोई जोर-शोर से उन्हें कुछ समझाने लगा। उड़ती हुई कुछ बातें आनन्द एंड कम्पनी तक पहुँचीं। वे समझ गए की उधर राम त्रिपाठी हैं और देवी सिंह को किसी भी तरह का कदम उठाने से रोक रहे हैं। मोबाइल पर जब बातचीत बंद हुई, तब तक देवी सिंह की भाव मुद्रा बदल गई थी। उन्होंने दो दिन का अवसर माँगा, ताकि वे सोच सकें। आनन्द बाबू समझ गए कि बिना नगेंद्र श्रीवास्तव के आए ये हस्ताक्षर नहीं करेंगे।
आनन्द बाबू जब घर लौटकर आए, तो उनका चेहरा उतरा हुआ था। पत्नी सब समझ गई, इसलिए उन्हें छेड़ा नहीं। तीसरे दिन नगेन्द्र श्रीवास्तव से आनन्द बाबू की बात हुई, तो उसने यह कहकर बात टाल दी कि राम त्रिपाठी बाहर गए हैं। उनके आने के बाद ही कोई निर्णय लिया जाएगा। बात टलती रही। एक दिन तीनों से इकट्ठे बात हुई तो बात बढ़ गई। उन्होंने साफ मना कर दिया।
नगेन्द्र श्रीवास्तव बोले-‘’भाई,हम तो देवी के टीले को नहीं हटाएँगे। उनका शाप नहीं लेंगे।‘’
देवी सिंह ने हाथ जोड़े-‘’हमारे बाल-बच्चे है, हमें माफ करें।‘’
राम त्रिपाठी ने आग में घी छोड़ा-‘’ये धर्म विरोधी काम न तो हम करेंगे, करने देंगे। कोई करेगा तो नतीजा भुगतेगा।‘’
दोनों पक्षों में तू-तू, मैं-मैं होने लगी। कॉलोनी में दो गुट बन गए, निश्चित रूप से आनन्द बाबू के पक्ष वालों की संख्या कम थी। फिर उनकी पढ़ी-लिखी पत्नियाँ अपनी सम्र्भांत पहचान के कारण घर के अन्दर थीं और वहीं से सब देख-सुन रही थीं, पर दूसरे पक्ष वालों में उनके घर की स्त्रियाँ भी शामिल हो गईं और वे लोग भी जो छठ व्रत करते-करवाते थे। स्त्रियाँ खूब चीख़ीं-चिल्लाईं।
एक ने कहा-‘’छठ माता का घर तोड़ने चले हैं सब, इनका भी घर टूटेगा।‘’
दूसरी बोली-‘’अपनी संतानों की भी चिंता नहीं। अगर कुछ हो-हवा गया उन्हें, तब समझेंगे।‘’
तीसरी ने ताना कसा-‘’अरे कई तो बाँझ हैं, उन्हें क्या चिंता!’’ उसने आनन्द बाबू के घर की तरफ इशारा भी किया!
आनन्द बाबू की पत्नी खिड़की से इस झगड़े को देख रही थी। यह ताना उसके सीने में आ धँसा। शादी के कुछ महीने बाद ही किसी गड़बड़ी के कारण उनका गर्भाशय निकाल दिया गया, जिसके कारण वे माँ नहीं बन सकी थीं। एक बच्चे को गोद लेकर उसे अपने बच्चे से भी ज्यादा प्यार से पति-पत्नी पल रहे थे। वे घर के भीतर चली गई और बच्चे को सीने से लगाकर बिस्तर पर लेट गईं। उनकी आँखों से झर-झर आँसू बह निकले। उधर आनन्द बाबू के सभी साथियों की पत्नियाँ घरों से बाहर निकलकर अपने-अपने पतियों को अंदर ले गईं और सख्त हिदायत दे दी-इस मसले में मत पड़ो... हमारे बाल-बच्चे हैं। आनंद बाबू का क्या! कौन अपना बच्चा है?’ आनन्द बाबू अकेले खड़े देर तक उस भीड़ से जूझते रहे और अंत में घर की तरफ बढ़े |उन्हें समझ में गया था कि यह मसाला इतना आसान नहीं , जितना वे समझ रहे थे। उन्होंने बड़े-बड़े अपराधियों को कुछ नहीं समझा था। मन्त्री, विधायक भी उनके प्रश्नों से घबराते थे। उनकी निर्भीक पत्रकारिता के चर्चे दूर-दूर तक थे, पर वे बेजान ईंट के टीलों से हार रहे थे। क्योंकि उनके पीछे धर्म की शक्ति भी थी। जनमत था और थीं शातिर दिमागों की तिकड़में। वे सोचने लगे-आखिर मैं अपने लिए क्या चाहता था। मैं तो इस पार्क में में बच्चों के खेलने के लिए झूला, फिसलन जैसी चीजें लगवाना चाहता था। उसमें सुंदर सुगंधित फूल-पौधे लगाना चाहता था। हरी-हरी घास उगाना चाहता था और भी कुछ सपने थे, पर लगता है वे पूरे न हो सकेंगे। यह पार्क तीन सौ तिरसठ दिन वैसे ही गंदा पड़ा रहेगा। इन टीलों पर कुक्कुर टांग उठाकर मूतेंगे, गाय गोबर करेंगी, मक्खियाँ और मच्छर कब्जा जमाएंगे और बच्चे सड़क पर खेलेंगे। बस साल में दो दिन यह पार्क जगमगाएगा। टीले साफ कर रंगे जाएंगे। पूरा पार्क गोबर से लिपा जाएगा। तालाब में साफ पानी भरा जाएगा। सजे-धजे स्त्री-पुरुष, बाल-वृद्ध पूजा का दौरा व सूप [जिनमें कई तरह के फल ,मेवे ,गन्ना ,भींगा चना,अच्छत ,कच्चवानी ठेकु तथा पूरियों के पाँच-पाँच जोड़े] लिए आएंगे और उन टीलों (सूर्य सविताओं) के चारों ओर आसन बिछाकर बैठेंगे। सूर्य सविता का विधिवत पूजन करके कलश पर आम का पल्लव तथा उसके ऊपर जलता हुआ दिया रखा जाएगा। फल-फूल, मेवा-पकवान, चना, अच्छत, गुड़ इत्यादि सम्पूर्ण सामान रखकर सूर्य सविता को अर्पण किया जाएगा|यपन तथा सिंदूर का टीका लगाया जाएगा। व्रती महिलाएँ पानी में उतरेंगी। अस्ताचल को जाते हुए सूर्य को हाथ जोड़कर प्रार्थना करेंगी। लोग भी सूपा लेकर खड़े हो जाएंगे। परिवार की नव-वधू या बिटिया व्रती की अयपन तथा सिन्दूर लगाएगी। फिर आँचल में सूपा दे दिया जाएगा। पंडित या परिवार का कोई सदस्य गंगाजल से अर्ध्य दिलवाएगा। अर्ध्य के बाद सूपा को नीचे जल से छूकर पाँच बार परिक्रमा करके पानी से निकल आएँगी, फिर सभी परिजन मिलकर हवन करेंगे। दूसरे दिन ब्रह्म मुहूर्त पू जा की चहल-पहल शुरू हो जाएगी। दौरा, कोषी व गन्ना लेकर लोग फिर आएंगे। सूर्य सविता की फिर पूजा की जाएगी। व्रती महिलाएँ पानी में उतरेंगी और पूर्वाभिमुख होकर हाथ जोड़कर भगवान भास्कर का ध्यान करेंगी तथा माता षष्ठी से आशीष मांगेंगी। भगवान भास्कर उदित होंगे। सभी अर्ध्य देंगे और ॐ ह्ह्राँ सूर्याम नम: से पार्क गूँज उठेगा। फिर प्रसाद बाँटकर सभी अपने-अपने घर चले जाएंगे और पीछे छोड़ जाएंगे गंदगी का अम्बार। पानी के अन्दर बाहर चढ़ाए गए प्रसाद सड़ेंगे, चींटियाँ, कीड़े-मकोड़े, कुत्ते धमा-चौकड़ी मचाएंगे।
यह सब सोचते हुए आनन्द बाबू घर के अंदर घुसे, उन्हें, कबीर का दोहा याद आया-यह तो मारग प्रेम का, खाला का घर नाहिं। सीस उतारे भुई धरे, तब आवे एहि माहिं। उन्हें लगा कि यह धर्म का मामला भी प्रेम के मामले से कम नहीं है। पर वे हारेंगे नहीं, अपनी कोशिश जारी रखेंगे। उन्होंने उम्मीद से पत्नी की तरफ देखा, पर पत्नी ने उनकी तरफ देखकर उपेक्षा से मुँह घुमा लिया और बच्चे को ज़ोर से सीने से चिपका लिया।

आनन्द बाबू को धक्का लगा। पूछ बैठे-‘’क्या हुआ? पत्नी ने बच्चे की तरफ इशारा किया। आनन्द बाबू ने बच्चे के सिर पर हाथ रखा। वह बुखार से तप रहा था। आनंद बाबू घबरा गए । एक पल को उनके मन में आया कि कहीं छठ माता का शाप.... । पर दूसरे ही क्षण उन्होंने सिर झटक दिया। जब वे बच्चे को अस्पताल ले जा रहे थे। उन्होंने देखा कॉलोनी वाले अपनी खिड़कियों से झाँक रहे हैं और जब वे अस्पताल से लौटे तो पूरी कॉलोनी में यह प्रचार हो चुका था कि छठ माता ने आनंद बाबू को सबक दे दिया है।       

2 comments:

  1. रंजना जी, बहुत अच्छा लिखा है.मुझे साठ और सत्तर के दशक के अपने जीवन की याद दिला दी.हमलोगों ने अपने स्तर पर बहुत प्रयत्न किए ( लेखकों, कवियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के अतिरिक्त). पर धर्म की घुट्टी बहुत जबर्दस्त पिलाई गई है, सदियों से.बहुत समय लगेगा.पर हर काल में सही सोच वालै को प्रयत्न तो करना ही होगा.आप कर रही हैं और अच्छे लेख लिख रही हैं इसलिए बधाई की पात्र हैं.शिक्षा का प्रसार ही सोच को सही दिशा में ले जाने में सहायक होगा.मेरा एक छोटा सा अनुभव है, अपने प्रयत्न निष्फल होने पर मैने लोगों, खासतौर पर साधारण वर्ग को उनकी आस्था पर सीधे चोट करने के बजाय, धर्म की उन कहानियों का उल्लेख किया जो ईश्वर में विश्वास तो दिलाती है पर, पूजा-पाठ, कर्मकांड आदि को आवश्यक नहीं बताती.इसका इतना असर कईयों पर हुआ कि उन्होंने ईश्वर पर विश्वास करना तो नहीं छोड़ा पर पाखंड पर विश्वास करना छोड़ दिया.
    बैंक में आने के बाद घर गृहस्थी में उलझ गया और बैंक के इतर पढ़ना लिखना छूट गया.
    आप लेखिका हैं आपकी कलम में बहुत ताकत होती है और लोगों को बहुत प्रभावित करती है.इसलिए ऐसे लेखकों को देख खुशी होती है कि समाज और मनुष्यता के लिए सोचने वालों की संख्या बढ़ती जा रही है.
    आप यशस्वी हों,मानवता की मार्गदर्शी बनें यही कामना है.

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  2. बेहतरीन कहानी ... वंदना बाजपेयी

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