मेरे कस्बे में लंगड़ा पंडित मशहूर थे |सभी हिन्दू घरों में पूजा-पाठ,शादी-ब्याह वे ही कराते थे |क्या मजाल कि कोई दूसरा पंडित आस-पास फटक भी जाए|वैसे भी कस्बे वालों का उन पर बहुत ही विश्वास था |वे सबके पाँव-पूजित थे |पता नहीं वे पढ़े-लिखे थे भी या नहीं,क्योंकि जब मैंने संस्कृत पढ़ना सीख लिया, तो उनका अशुद्ध श्लोक बोलना खलने लगा था |एक बार टोक दिया,तो नाराज हो गए |माँ ने उनसे क्षमा माँग ली और मुझे भी मांगने को कहा |पर उस दिन से वे मुझसे आँखें चुराने लगे |पंडित जी की सबसे बड़ी ख्याति इस वजह से थी कि वे पुत्र-यज्ञ कराते थे |ना जाने कितने निसंतानों को उस यज्ञ के कारण संतान-सुख मिला था |पंडित जी के अनुसार यह वही पुत्र-यज्ञ था,जिसके करने से राजा दशरथ को चार-चार पुत्र प्राप्त हुए थे | यह बहुत ही महंगा यज्ञ था,इसलिए बेचारे गरीब मन मसोस कर रह जाते थे |इस यज्ञ के कारण पंडित जी मालामाल हो गए| ऊपर से लोग उन्हें भगवान की तरह पूजने लगे |पंडित जी ने तीन विवाह किए थे पर इस बात से उनकी प्रतिष्ठा पर कोई आँच नहीं आती थी |किसी को उनके व्यक्तिगत जीवन से कुछ लेना-देना नहीं था |पढ़ाई के सिलसिले में मैं शहर आ गयी |एक बार दीपावली की छुट्टियों में घर आई,तो माँ घर में नहीं मिली |पता चला,लंगड़ा पंडित गुजर गए हैं और माँ उनके घर गयी हुई हैं |मैं भी वहाँ जा पहुंची |देखा कि उनकी लाश यूँ ही पड़ी हुई है |उनकी तीनों पत्नियाँ बिलख रही हैं |लोगों की भीड़ जमा है और विचार-विमर्श हो रहा है कि क्या किया जाए ?परेशानी क्या है -मैंने माँ से पूछा और यह जानकर सन्न रह गयी कि पुत्र-यज्ञ कराने वाले पंडित जी की तीन पत्नियों के बावजूद अपनी कोई संतान नहीं थी|
Sunday, 23 October 2011
Saturday, 22 October 2011
कितना अंतर ?
मेरे कॉलोनी में अक्सर एक फकीर आते हैं |श्वेत वस्त्र,गले में कौडियों की माला,कंधे पर सफेद झोला,हाथ में अंडाकार कटोरा,निर्मल,स्वच्छ आँखें आकाश की ओर उठी हुईं |वे किसी के दरवाजे पर रूकते नहीं |बस यह गाते हुए चलते जाते हैं कि -'अल्लाह सबका भला कर| देने वाले का भला कर,ना देने वाले का भी भला कर|' जो कोई कुछ भी दे देता है,वह ले लेते हैं |कोई शिकायत नहीं करते |फिर भी हिन्दू बहुल कॉलोनी वालों को उनका आना अच्छा नहीं लगता |कॉलोनी में एक बाबा जी भी अक्सर आते हैं |गेरुआ वस्त्र,माथे पर त्रिपुंड,गले में रूद्राक्ष ,आँखें लाल,कंधे पर बड़ा-सा गेरुआ झोला,चाल में एक ठसक |दरवाजों पर पहुँच कर जोर से आवाज लगाते हैं-'कोई है,देखो कौन आए हैं ?' दरवाजा खुलने में देर होने पर क्रोधित होकर शाप देने लगते हैं |कितना भी दो,कभी संतुष्ट नहीं दीखते |खुद ही मांग लेते हैं |खुश कर देने वालों को उनका आशीर्वाद मिलता है,ना कर पाने वालों को शाप |फिर भी कॉलोनी वालों को उनका इंतजार रहता है |
धोकरकसवा
गोरखपुर मंडल के ग्रामीण क्षेत्रों में आजकल धोकरकसवा का खौफ छाया गया है |वैसे भी इस मंडल में किसी न किसी का खौफ छाया रहता है ||बस नाम बदल जाता है |पहले लकड़सुंघवा फिर मुँहनोचवा और अब धोकरकसवा |धोकरकसवा बच्चों को उठा ले जाता है,इस डर से ग्रामीण शाम ढलते ही अपने बच्चों को घरों में कैद कर दे रहे हैं और खुद जग कर गाँव की रखवाली कर रहे हैं |धोकरकसवा स्त्री-पुरूष किसी भी रूप में हो सकता है |उसके हाथ में बोरा या बड़ा-सा झोला होता है|जिसमें वह बच्चों को भर कर उठा ले जाता है|लीजिए भई २१ अक्टूबर को बोरे में बालक को भरते दो धोकरकसवा ग्रामीणों द्वारा पकड़े गए हैं |बहरहाल पुलिस की पूछ-ताछ जारी है और निश्चित रूप से वे भी उन्हीं लोगों में से निकलेंगे,जो शक के कारण इन दिनों ग्रामीणों के शिकार हुए हैं |आजकल गांवों में शाम-ढले किसी रिश्तेदारी में जाना मुहाल है|कुछ लोग इसी बहाने अपने दुश्मनों से बदला भी चुका ले रहे हैं |धोकरकसवा की कहानी मैंने अपने बचपन में माँ से भी सुनी थी |हम बच्चे दुपहरिया या शाम ढलने के बाद घर से बाहर न निकले,इसलिए माँ ने धोकरकसवा से डरा रखा था कि धोकरकसवा बच्चों को उठा कर अपने घर ले जाता था और उन्हें पका कर खा लेता है |यह बात तब उतनी विश्वस्त नहीं लगती थी,पर अब निठारी कांड के बाद यह भी असम्भव नहीं लगता |पुराने धोकरकसवा को शायद आज की तरह बच्चों का उपयोग करना नहीं आता था |या यूं कहें कि वह इस कदर गिरा हुआ नहीं होता होगा |नया धोकरकसवा भी पुराने की तरह ही है |शायद ग्रामीणों की कल्पना आज भी उस क्रूरता तक नहीं पहुँच पा रही है,जो आजकल अपहृत किए गए बच्चों का नसीब बनी हुई है |बच्चों को अपंग कर उनसे भीख मंगवाना अब पुरानी बात है,बलि चढाना भी |अब तो बच्चों के अंगों को निकाल कर बेच दिया जा रहा है |उनसे देह-व्यापार कराया जा रहा है|मनुष्य के गिरने की इससे बड़ी बात और क्या हो सकती है ?बच्चों को इस गलीज काम के लिए दूसरे देशों में भेजा जा रहा है |अभी इसी सप्ताह झारखंड के पश्चिमी सिंघभूम जिले में रेलवे पुलिस ने तीन नाबालिक बच्चों के साथ एक फ्रांसीसी नागरिक गोएट को गिरफ्तार किया है|बच्चे पश्चिम बंगाल के हैं,बच्चों को बहला –फुसलाकर ले जा रहा यह विदेशी शालीमार से कुर्ला जा रही कुर्ला एक्सप्रेस ट्रेन के प्रथम श्रेणी के वातानुकूलित कोच में ही बच्चों के साथ कथित तौर पर गलत हरकत कर रहा था |
बच्चों का शोषण विविध तरीकों से किया जा रहा है|कहीं वे बंधुआ मजदूर हैं,कहीं कबाड़ी |चोरी-चकारी से लेकर नशा बेचने का काम वे कर रहे हैं |आतंकवादी भी अब उनका उपयोग करते देखे जा रहे हैं | चूड़ी व पटाखे बनाने जैसे खतरनाक कामों में भी बच्चे देर रात तक काम करके अपना बचपन व स्वास्थ्य गँवाते देखे जा सकते हैं |बच्चे यह सब मजबूरी के कारण कर रहे हैं |इनमें सारे बच्चे अपहृत नहीं हैं |कुछ घर से भागे हुए हैं,तो कुछ अपने माता-पिता की सहमति से भी ये सब कर रहे हैं| बच्चों का बचपन खतरे में हैं |ना जाने कितने धोकरकसवा रक्तबीज की तरह बढ़ते जा रहे हैं |वे काल्पनिक धोकरकसवा नहीं हैं,ना ही उनकी तरह बोरा लेकर घूमने वाले गँवार|उनके हाथ बड़े हैं और पहुँच भी |उनको पहचानने की जरूरत है और उनके खिलाफ कठोर कदम उठाने की भी,वरना देश के भविष्य को नहीं बचाया जा सकता |
सैंया भए कोतवाल अब डर काहें का
किसी पति-मुग्धा की यह गर्वोक्ति एक समय के कोतवालों की साफ़-सुथरी छवि को प्रस्तुत करती है |यह कथन मुहावरा बन गया |मतलब साफ़ था कि कोतवाल के होते स्त्री को कोई खतरा नहीं था और पति कोतवाल हो जाए तो बिलकुल ही नहीं |वह स्त्री निश्चिन्त होकर रात-बिरात मनपसंद कपड़ों और भरपूर जेवर पहन कर भी बाहर निकल सकती थी |उसकी इज्जत और जेवर दोनों की सुरक्षा की गारंटी मिल जाती थी [वैसे भी उस समय के रजनीचरों में चोर-डाकू ही रहे होंगे,किडनेपर्स और रेपिस्ट नहीं]शायद कोतवाल उन दिनों रात को जगकर जनता के जान-माल की सुरक्षा करते रहे होंगे और उस समय के चोर-उचक्के,डाकू उनसे भय भी खाते होंगे |आज समय बदल गया है |रजनीचरों में चोर-उच्चके,डाकू-स्मगलर के साथ रेपिस्ट,किडनेपर्स,हत्यारे और बाईकर्स भी शामिल हो गए हैं,तो निश्चित रूप से कोतवालों का काम बढ़ गया है |कुछ कोतवाल तो उनके मौसेरे भाई की भूमिका में आ गये हैं,तो कुछ आराम से रात को सोते रहते हैं |वैसे भी रात को जागना सेहत के लिए अच्छा नहीं होता[वैसे वे तो दिन में भी सोते ही रहते हैं तभी तो अपराधी दिन में भी अपराध करने लगा है,रात का इंतजार कौन करे? कोतवाल साहब दिन में भी अपराध हो चुकने के बाद ही पहुँचते हैं |समय से पहुंच कर अपनी जान जोखिम में क्यों डालें आखिर उनके भी बाल-बच्चे हैं |
कहा जाता है कि किसी शहर का रात भर जागना उसकी जिंदादिली को दर्शाता है |कोतवाल साहब को यह जिंदादिली पसंद नहीं |नालायक ना खुद सोते हैं,न सोने देते हैं |ऊपर से शहर की स्त्रियाँ भी कम नहीं |रात-बिरात भी निकलती हैं,कपड़े भी ढंग से नहीं पहनती हैं और जब उनके साथ कुछ बुरा हो जाता है तो कोतवालों को कोसती हैं,यह तो बेइंसाफी है |इधर राजधानी में स्त्री-अपराध कुछ ज्यादा ही बढ़ गए हैं,इसलिए कोतवाल साहब ने सलाह दी है कि –महिलाऐं रात –बिरात घर से बाहर ना निकलें |हो सकता है उनकी अगली सलाह कपड़ों के बारे में हो –कि वे मार्डन कपड़े ना पहनें |जेवर पर तो वे पहले ही प्रतिबंध लगा चुके हैं |भई गुण्डे-मवालियों को तो नसीहत दी नहीं जा सकती,वे तो नालायक हैं ही |स्त्रियाँ तो समझदार हैं |फिर दुर्घटना से सावधानी भली |उक्ति भी तो है –‘सावधानी हटी दुर्घटना घटी’|अब आजादी के नाम पर ‘आ बैल मुझे मार’को आजमाना स्त्री के हित में तो नहीं ही है |कोतवाल साहब अपना नैतिक कर्तव्य निभा रहे हैं और स्त्रियाँ हैं कि इसे अस्मिता का प्रश्न बना रही हैं |अब इनसे कड़ाई से कुछ कहना भी मुश्किल है |अब भला क्या बुरा कह दिया था कनाडा के उस पुलिस अधिकारी ने,यही ना कि ‘लड़कियों को बलात्कार से बचने के लिए स्लट जैसे कपड़े नहीं पहनने चाहिए|’लीजिए भई फिर तो पूरी दुनिया में ही स्लट-वाक् शुरू हो गया |कोतवाल साहब तो चाहते हैं कि स्त्रियाँ घर में रहें |चूल्हा और बच्चे संभालें |बाहर निकलें,तो पूरे कपड़ों में निकलें |कोशिश करें कि सिर भी ढंका हो|यही तो कुलीन स्त्रियों का धर्म है |उनके इस कदम से कोतवालों का काम कितना आसान हो जाएगा |
अब अपराधी पहले की तरह कोतवाल साहब के दबदबे को नहीं मानते,उनसे भय नहीं खाते|कारण यह भी हो सकता है कि पहले के कोतवाल अपराधियों से नहीं खाते थे,इसलिए उनके हित में नहीं गाते थे |आज स्थिति उलट है |आज तो कोतवाल खुद ही राह चलती स्त्री को ऐसे घूरते हैं कि वह शर्म से पानी-पानी हो जाती है |अपने प्रति हुए अपराध की शिकायत करने स्त्री थाने जाए,तो ऐसे सवाल-जबाब कि भागते ही बने |कई बार तो बलात्कार की शिकार का ही बलात्कार कर दिया जाता है और कई बार अपराध छिपाने के लिए हत्या भी |इधर लगातार कई घटनाएँ ऐसी घटी हैं कि जिसने प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया है कि कोतवाल रक्षक की भूमिका में है कि भक्षक की |
यह अच्छा है कि शिकारी का तो कोतवाल कुछ ना बिगाड़ पाए,बस शिकार को ही नसीहतें देते रहे,वह भी सुरक्षा के नाम पर |यह कैसा गणतन्त्र है,जहाँ स्त्री ही हिंसा का शिकार हो रही है और उसको ही सजा दी जा रही है?ढेर सारी पाबंदियां और जकड़न सिर्फ इसलिए कि स्त्री अपनी सुरक्षा खुद नहीं कर सकती |होना तो यह चाहिए कि कोतवाल शोहदों को गिरफ्तार करें,ताकि दूसरे ऐसा करने से डरें,पर नहीं स्त्री को नसीहत देना ज्यादा आसान है |इस तरह से तो वे असामाजिक तत्वों को सन्देश दे रहे हैं कि स्त्रियाँ ही दोषी हैं |कोतवाल को असामाजिक तत्वों के खिलाफ नियम बनाकर,सुनसान सड़कों पर सुरक्षा गार्डों की व्यवस्था कर,स्त्री की शिकायत को तत्काल दर्ज करके उस पर कार्रवाई कर अपनी बिगड़ रही छवि को सुधारना चाहिए |
Monday, 17 October 2011
साम्य
सुखिया और दुखिया जुड़वा बहनें थीं |सुखिया अपूर्व सुन्दरी होने के कारण अमीर घर में ब्याही गयी |यूँ कहें कि उसका रिश्ता खुद पाँव चलकर उसके घर आया |दुखिया साधारण,सीधी-सादी घरेलू टाइप की लड़की थी |उसकी शादी में बड़ी मुश्किलें आई |वह एक गरीब किसान के घर की शोभा बनी |भाग्य की विडम्बना -कुछ दिन बाद ही उसके खेत बिक गए और उसका पति किसान से मजूर हो गया |दुखिया रोटी की समस्या से जूझते हुए एक दिन कुपोषण का शिकार होकर मर गयी |
सुखिया ससुराल में राज कर रही थी |कुछ दिनों बाद उस पर विश्व-सुन्दरी बनने की सनक सवार हुई |शरीर को स्लिम बनाने के लिए व्यायाम,डाईटिंग वगैरह करने लगी |मात्रा कुछ ज्यादा हो गई और एक दिन वह चक्कर खाकर गिरी और स्वर्ग सिधारी
दोनों बहनों की मृत्यु में एक साम्य था |दोनों के पेट में अन्न का दाना नहीं था|
परिवर्तन
"माँ ...माँ सुना तुमने ?डाक्टर रमेश तिवारी के बेटे ने एक हरिजन कन्या से विवाह कर लिया ...|"
"बहुत अच्छा किया |हमारे नौजवान ही देश की दशा सुधार सकते हैं |जाति-धर्म व्यर्थ के ढकोसले हैं |विवाह की सफलता तो सच्चे और अच्छे जीवन-साथी पर निर्भर है और अच्छा साथी जिस जाति-धर्म में मिले,चुन लेना चाहिए |"
"माँ" कितनी अच्छी हो तुम !कितने महान विचार हैं तुम्हारे!बहुत दिनों से तुम्हें एक बताना चाह रही थी |मैं ...कल्लू धोबी के बेटे रवि चौधरी से प्यार करती हूँ और उससे ....|"
'चटाक....|कमबख्त ...बेशर्म ....नीच ...कुलबोरनी!ब्राह्मण कन्या होकर एक शूद्र से ...!हमारे खानदान में ना तो ऐसा हुआ है ,ना होगा |दो अक्षर पढ़ क्या गयी ...परम्परागत नियमों को तोड़ने चली हो |कल से तुम्हारा कालेज जाना बंद ...|
"बहुत अच्छा किया |हमारे नौजवान ही देश की दशा सुधार सकते हैं |जाति-धर्म व्यर्थ के ढकोसले हैं |विवाह की सफलता तो सच्चे और अच्छे जीवन-साथी पर निर्भर है और अच्छा साथी जिस जाति-धर्म में मिले,चुन लेना चाहिए |"
"माँ" कितनी अच्छी हो तुम !कितने महान विचार हैं तुम्हारे!बहुत दिनों से तुम्हें एक बताना चाह रही थी |मैं ...कल्लू धोबी के बेटे रवि चौधरी से प्यार करती हूँ और उससे ....|"
'चटाक....|कमबख्त ...बेशर्म ....नीच ...कुलबोरनी!ब्राह्मण कन्या होकर एक शूद्र से ...!हमारे खानदान में ना तो ऐसा हुआ है ,ना होगा |दो अक्षर पढ़ क्या गयी ...परम्परागत नियमों को तोड़ने चली हो |कल से तुम्हारा कालेज जाना बंद ...|
Friday, 14 October 2011
शोक
दो सम्प्रदाय के युवक एक दिन एक-दूसरे से भिड़ गए |पहले ने दूसरे को माँ की गाली दी |दूसरे ने माँ के साथ बहन को भी शामिल कर लिया |दोनों ने अपने-अपने मर्द पूर्वजों के संबंध एक-दूसरे की स्त्री पूर्वजों से साभिमान स्थापित करवाया |बात बढ़ती गयी|लोगों ने बीच-बचाव कर दोनों को घर जाने को कहा |युवकों का क्रोध तो समय के साथ थोड़ा कम हुआ,पर वैर मुरब्बे की तरह टिकाऊ हो गया|एक दिन पहले ने दूसरे की बहन को छेड़ दिया,तो दूसरे ने मौका पाकर उसके बहन की इज्जत लूट ली |दुश्मनी बढ़ गयी,यहाँ तक कि एक दिन दोनों संप्रदायों में ठन गयी |दंगा भड़का|दोनों संप्रदायों ने एक-दूसरे के घर की स्त्रियों को लूटा-पीटा और अपमानित किया |दंगा खत्म हुआ,तो दोनों तरफ के मर्द अपनी जीत का जश्न मनाने लगे, पर उनकी औरतें अपने औरत होने पर शोक मना रही थीं |
Thursday, 13 October 2011
मजहब
गफूर मियाँ शिल्पकार थे, देवी-देवताओं की मूर्तियां बनाया करते थे |राम कृष्ण,गणेश,दुर्गा जैसे देवी-देवताओं से उनकी दुकान जगमगाती रहती थी |उनकी मूर्तियां बड़े-बड़े मंदिरों की शोभा बढाती थी और विदेशों में भी उनकी मांग थी |दुकान से उनकी गृहस्थी आराम से चल रही थी |वे पाँचों वक्त के नमाजी थे,धर्म-कर्म में उनकी बड़ी आस्था थी | आदमी भी बड़े बढियां थे |अभिमान तो मानो उन्हें छू तक नहीं गया था |सबके सुख-दुःख में हिस्सेदार रहते थे
दंगे में उनकी दुकान लूट ली गयी |मूर्तियां तोड़-फोड़ दी गयीं और वे इसलिए कत्ल कर दिए गए कि मुसलमान थे |यह रहस्य ही है कि उनके कातिल का मजहब क्या था ?
दंगे में उनकी दुकान लूट ली गयी |मूर्तियां तोड़-फोड़ दी गयीं और वे इसलिए कत्ल कर दिए गए कि मुसलमान थे |यह रहस्य ही है कि उनके कातिल का मजहब क्या था ?
Wednesday, 12 October 2011
नौकरी
रोटी एक थी |कुत्ते बहुत सारे |सभी भूखे थे और एक-दूसरे पर गुर्रा रहे थे |रोटी ऊँची जगह पर रखी हुई थी |भूखे कुत्तों की पहुँच से काफी ऊपर |वहाँ तक पहुंचना काफी जद्दोजहद का काम था |रोटी और भूखे कुत्तों के बीच पहरेदारों की लंबी फ़ौज थी,जो हथियारों से लैस खड़ी थी |रोटी तक पहुँचने के लिए कुत्तों को सबसे निपटना पड़ता |
इसी बीच ऊंची नस्ल का एक कुत्ता,जो एक संपन्न परिवार का पालतू था,शान से अकड़ता हुआ आया |पहरेदारों ने उसे कोर्निश की |उसे सम्मानपूर्वक रोटी सौंप दी गयी |भूखे कुत्ते इससे बेपरवाह खड़े अभी तक एक-दूसरे पर ही भौंक रहे थे |
इसी बीच ऊंची नस्ल का एक कुत्ता,जो एक संपन्न परिवार का पालतू था,शान से अकड़ता हुआ आया |पहरेदारों ने उसे कोर्निश की |उसे सम्मानपूर्वक रोटी सौंप दी गयी |भूखे कुत्ते इससे बेपरवाह खड़े अभी तक एक-दूसरे पर ही भौंक रहे थे |
Sunday, 9 October 2011
स्त्री के खल रूप का प्रचार
२८ मार्च २०१० को तिर्वा[कन्नौज]कोतवाली क्षेत्र के हरिहरपुर गाँव में देर रात एक माँ ने अपने दो मासूम बच्चों को हंसिए से काट डाला था |अखबार के अनुसार तो उसने उनके खून को भी गटक लिया था |४ जनवरी को पूर्णिया में भाजपा विधायक राजकिशोर केसरी की निर्मम हत्या उन्हीं के आवास पर रूपम पाठक ने कर दिया था |संतकबीरनगर के ग्राम बरईपार में कुछ दिन पूर्व एक प्रेमिका ने अपने प्रेमी को मिट्टी का तेल उड़ेल कर जला दिया |६ जुलाई,२०११ को कप्तानगंज[कुशीनगर] में संजू नामक स्त्री ने अपने पति की गला दबाकर हत्या कर दी |लन्दन में मई,२०१० को एक प्रेमिका ने प्रेमी की जीभ चुम्बन के बहाने काटकर अलग कर दिया तो,९ नवम्बर २०११ को वहीं की एक माँ ने अपनी नवजात बच्ची को वाशिंग मशीन में डालकर मार डाला |प्रेमी के साथ मिलकर पति की हत्या की खबरें तो हर दूसरे-तीसरे दिन मिल जाती हैं |ऐसी खबरें भी पूर्वांचल में नियमित छप रही हैं,जब औरतें बच्चों को मारकर खुद मर जा रही हैं |कोई जहर खाकर,कोई नदी-नालेमें कूदकर,तो ज्यादातर ट्रेन के नीचे लेटकर |कभी-कभी बच्चों को फेंकने या बेचने वाली,उनसे भीख मंगवाने वाली तथा दूसरे कई और अपराध करवाने वाली माओं का भी पता चलता है |इस तरह स्त्री के हिंसक रूप की कई तस्वीरें हमारे सामने आती हैं |स्त्री के हिंसक रूप का प्रचार-प्रसार मीडिया ऐसे करता है,जैसे बदला ले रहा हो |जबकि ऐसी खबरें इक्का-दुक्का ही होती हैं और उनके पीछे भी स्त्री पर कई मनोवैज्ञानिक दबाव होते हैं|सोचने की बात है कि जिस माँ ने नौ महीने बच्चे को गर्भ में रखा,उसे अपना रक्त पिलाया ,उसी का रक्त वह पी सकती है?जिस डायन की कल्पना हर देश में मौजूद है,वह भी अपने बच्चों को बख्श देती है,फिर कैसे कोई माँ अपने बच्चे को इस क्रूरता से मारेगी?माँ तो गुस्से में बच्चे को पीटने के बाद खुद रोने लगती है |बचपन में एक फिल्म देखी थी |नाम था –‘समाज को बदल डालो’|उस फिल्म में एक माँ पर आरोप है कि उसने अपने पांच[कम-ज्यादा हो सकते हैं]बच्चों को जहर खिलाकर मार डाला था| वह एक ऐसी औरत थी,जो अकेले समाज से लड़ते हार जाती है और भूख से तड़पते बच्चों को मुक्त करने के लिए भात में जहर सानकर खिला देती है |वह खुद भी खाती है,पर उसके प्राण नहीं निकलते और वह अपराधिनी मान ली जाती है | उस माँ की अंतर्वेदना की कल्पना करें |दूसरी तरफ वही समाज,जो उसकी इज्जत के बदले रोटी देने की बात कर रहा था |जो बच्चों के साथ भिखारियों से बदतर व्यवहार कर रहा था,उस माँ पर थूकने लगता है |समाज आज भी कहाँ बदला है?आज भी वह मजबूरी का सौदा करता है |ऐसे ही तो नहीं देह-व्यापार फल-फूल रहा है |
हंसिए से बच्चों को काट देने वाली सुमन की उम्र मात्र ३५ थी,पर बच्चे पांच थे |पति मजूर,वह भी हमेशा घर से बाहर| उसकी सबसे बड़ी बेटी बबली ११ वर्ष,अंजली १० वर्ष,अतुल ९,तन्नू ६ तथा सबसे छोटा अन्नू ५ वर्ष का था |सभी बच्चे पढ रहे थे |जाहिर है लड़ते-झगड़ते भी होंगे |उस दिन बच्चों के ना पढ़ने से बवाल हुआ |स्थिति बेकाबू हो जाने पर गुस्से से पागल हुई सुमन ने अन्नू-मन्नू को काट डाला |कह सकते हैं,उसे खुद पर काबू रखना चाहिए था |बच्चे तो शरारती होते ही हैं |समस्या सुमन के स्वास्थ्य की लगती है | बच्चों की परवरिश,शिक्षा की चिंता के साथ अर्थाभाव मानसिक दबाव बना रहा होगा |बढ़ती मंहगाई में मात्र मजूरी से सुमन कैसे घर और बच्चों को सम्भाल रही होगी?ऊपर से पति का कोई सहयोग नहीं |निश्चित रूप से वह चिड़चिड़ी हो गयी होगी और बच्चों के ना पढ़ने पर आपा खो बैठी होगी |लेकिन इस तरह ..?कह सकते हैं कि जब संभाला नहीं जा रहा था,तो क्या जरूरत थी,इतने बच्चों की ?इस विषय में इतना ही कहा जा सकता है कि अभी तक भारतीय स्त्रियों को कोख के बारे में निर्णय का अधिकार नहीं है,उपर से जननी की सेहत की इस देश में घोर उपेक्षा होती है|सुमन शायद ही अपनी सेहत पर ध्यान दे पाती होगी?उस पर हमेशा मानसिक दबाव रहता होगा |खाना-कपड़ा,किताब-कापी,स्कूल-फीस,हारी-बीमारी पचासों समस्याएं |सुमन संतुलन खो बैठी |नहीं खोना चाहिए था,पर खो बैठी |उसकी मानसिक पीड़ा की कल्पना करें कि जिन बच्चों की वह जननी थी,उन्हीं की हत्यारिन बन बैठी |
मंजू ने भी पति की हत्या जानबूझकर नहीं की |शराब व जुए की अपनी लत पूरी करने के लिए पति ने अंतिम बचे पुश्तैनी मकान को सस्ते में बेचकर रूपए किसी पट्टीदार के खाते में जमा कर दिया था | ऊपर से शराब के नशे में धुत्त मछली लेकर घर आया |पत्नी ने मछली पकाने से इंकार किया,तो झगडा शुरू होगया |पति अपना मफलर गले में लपेटकर उसे खिंच देने की धमकी देने लगा,तो नाराज पत्नी ने खुद मफलर कस दिया,जिससे पति की मौत हो गयी |सोचा जा सकता है कि मंजू ने किस डिप्रेशन में ऐसा किया होगा,पर वह गुनहगार तो है ही |कई बार अपनी ही बेटी को पति की हवस से बचाने के लिए औरत अपराध कर बैठती है |कई ऐसे उदाहरण हैं,जिन्हें उद्धृत करते हुए भी शर्म आती है |देहरादूनमें १३ अगस्त को दमयन्ती नामक स्त्री ने अपने पति के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई कि जब वह तीन महीने अपने मायके में थी |आरोपी ने अपनी ही १६ साल की बेटी के साथ लगातार बलात्कार किया|निश्चित रूप से महिला ने संयम का परिचय देकर क़ानून का सहारा लिया,अन्यथा ऐसे हालत में पति की हत्या हो सकती थी |
आज अधिकांश आदमी डिप्रेशन में जी रहा है |तमाम दबाव उस पर हैं |बढ़ता प्रदूषण भी उनमें से एक है |एक शोध में बताया गया है कि आदमी तो आदमी,बंदर भी डिप्रेशन में हैं और लोगों को बेवजह काट रहे हैं |कारण –पर्यावरण का नष्ट होना,पेड़-पौधों का कटते जाना |प्राकृतिक आहार की किल्लत से बंदर मनुष्यों का जूठन खा रहे हैं और उसी की तरह डिप्रेशन के शिकार हो रहे हैं |मेरे इस विवरण का यह अर्थ कदापि नहीं लिया जाना चाहिए कि मैं स्त्रियों के अपराध को कम करके देख रही हूँ |मेरा सिर्फ यह कहना है कि किसी भी स्त्री को दोषी करार देने से पहले उन स्थितियों-परिस्थितियों पर भी विचार किया जाए,जो ममतामयी माँ को इस कदर निर्मम बना रही है |
पारिवारिक कारणों से हत्या-आत्महत्या करने वाली स्त्रियों पर अंगुली उठाने से पहले विवाह संस्था को कटघरे में खड़ा किया जाना चाहिए,जिसमें आज भी स्त्री चैन से नहीं जी पा रही है|जो ना तो उसे संरक्षण दे पा रही है,ना खुशी |जहाँ अराजकता का बोल-बाला है|स्त्री को किसी भी प्रकार का फैसला लेने का अधिकार नहीं |ऐसे में उसे लगता है कि उसको अपनी या अपनी संतान पर ही हक है,जिसे वह खत्म कर सकती है |यहाँ भी मामला डिप्रेशन का ही है |गरीबी के कारण जो स्त्री अपराध कर रही है,उसका जबाव तो सरकार ही दे सकती है |
स्त्री अपने स्त्रीत्व का अपमान ज्यादा देर नहीं सह सकती |प्रेमी हो या पति जब वह उससे बेवफाई करता है या बार-बार उसे अपमानित करता है,उसकी कमियों का सबके सामने मखौल उड़ाता है,तो वह प्रतिशोध से भर जाती है |परिणाम किसी की जीभ कटती है,तो किसी की गर्दन |रूपम पाठक ने क्या यूँ ही भाजपा विधायक की हत्या कर दी थी ?सत्ता के नशे में स्त्रियों को ‘यूज और थ्रो’ करने वाले कभी-कभी स्त्री के प्रतिशोध में जल ही जाते हैं |स्त्री देह से दुर्बल होने के कारण अकेले पुरूष का सामना नहीं कर पाती,तो उस पुरूष को हथियार बनाती है,जो उसकी देह का कद्रदान[प्रेमी] है,फिर उस हथियार से अपना प्रतिशोध लेती है |अक्सर वह प्रेमी देह-सुख के लिए नहीं,अपने स्त्री होने को महसूसने के लिए बनाती है |प्रेमी उसके स्त्रीत्व को सम्मान देता है,उसको समझता है |क्यों पति यह नहीं कर पाता?क्यों घर की दाल समझकर उसे दलता ही रहता है?प्रेमी प्रेमिका को अपनी तरह इंसान मानता है,मनाने के लिए पैर तक छू लेता है,उसका अहं कभी उसके प्रेम पर हावी नहीं होता,पर वही प्रेमी पति बनते ही अहंकार से भर जाता है |अपनी गलती कभी नहीं मानता |पत्नी को हर बात में उसके पैर छूने पड़ते हैं |यदि पति प्रेमी बन जाए,तो ना जाने कितने स्त्री-अपराध बंद हो जाएँ |पर पति होने के अहंकार में वह लगातार स्त्री को प्रताड़ित व जलील करता रहता है,इसलिए उसके कमजोर पड़ते ही स्त्री उस पर हावी हो जाती है या फिर अपराध का रास्ता अख्तियार कर लेती है | ये सारी बातें मैं अपराधिनी मान ली गयी कई औरतों से बात करके जान पाई हूँ |मैं एक ऐसी औरत से मिली,जिसे पहली बार देखकर चीख पड़ी थी,उसका मुँह बुरी तरह जला हुआ था |ऊपर के होंठ उलट जाने से दांत दिखाई देते थे |नाक इस तरह सिकुड़ चुकी थी कि मात्र छिद्र ही दीखते थे |बस चेहरे में आँखें ही ठीक [बहुत सुंदर] थी,साथ में देह भी |पता चला उसके चेहरे को उसके पति ने ही इस तरह जलाया है कि कोई पुरूष आकर्षित न हो सके |कभी वह अपने कस्बे की सबसे सुंदर लड़की हुआ करती थी |पिता की इकलौती पुत्री थी,इसलिए पिता के बाद उन्हीं के विशाल घर में पति के साथ रहती थी |समय बिता एक रेलवे का अफसर उसके घर में किरायेदार बन कर आया और मुंहजली का होकर ही रह गया |कस्बे में सभी उस स्त्री को ‘एक फूल दो माली’ कहते हैं |उसे गलत समझते हैं |पति को कोई कुछ नहीं कहता,जबकि सब जानते हैं कि वह पूर्ण पुरूष भी नहीं|उस स्त्री के प्रेमी से ही तीन बच्चे हैं |वह चाहती तो पति को अपने घर से निकाल सकती थी,पर उसने ऐसा नहीं किया |
फूलन देवी को ही लें,क्या वह बुरी स्त्री थी ?अपने प्रारम्भिक दिनों में बिना मर्जी की शादी और कई बार यौन-उत्पीड़न का शिकार होने के बाद ही वह डाकू बनी |१९८१ में उसने अपने साथी डकैतों की मदद से उच्च-जातियों के गाँव में २० से अधिक लोगों की हत्या कर दी थी |उत्तरी और मध्य प्रदेश के उच्च-जाति वाले ही उसकी हिंसा के शिकार हुए|अगर वह बुरी होती,तो भारत सरकार से समझौता करके ११ साल जेल की सजा नहीं काटती और जेल से रिहा होकर सांसद नहीं चुनी जाती |फूलन ने जाति-व्यवस्था के खिलाफ जो विरोध किया,उसने उसे समाज के दबे-कुचले लोगों के अधिकारों का प्रतीक बना दिया |तभी तो अन्तरराष्ट्रीय महिला-दिवस के अवसर पर ‘टाईम’ मैगजीन ने इतिहास की ‘सबसे विद्रोही महिलाओं’की सूची में फूलन देवी को चौथे नम्बर पर रखा है |उसका कहना है कि भारतीय ग़रीबों के संघर्ष को स्वर देने वाली और इस आधुनिक राष्ट्र के सबसे दुर्दांत अपराधी के रूप में फूलन को याद किया जाएगा |
इन प्रसंगों को एक साथ रखने का कारण मीडिया द्वारा स्त्री के खल रूप का व्यापक प्रचार है |धारावाहिकों में सजी-संवरी औरतों के षड्यंत्र,उनकी आँखों व भौंहों का संचालन,टेढ़ी मुस्कान को देखकर कोफ़्त होने लगी है कि क्या स्त्रियों के पास इन सबके अलावा और कोई काम नहीं ?कहीं यह सब स्त्री को पीछे खींचने की सोची-समझी साजिश तो नहीं ?स्त्री को इन्हीं सब में उलझाकर रचनात्मक होने या विविध क्षेत्रों में पुरूषों के समकक्ष खड़ा होने से रोका तो नहीं जा रहा ?यह सच है कि स्त्री भी खल होती रही है और आगे भी हो सकती है,पर इतनी भी नहीं कि उसके सारे स्त्री-गुण तिरोहित हो जाएँ |पुरूष-मानसिकता का अनुकरण करने वाली स्त्रियाँ ही खलनायिका होती हैं और यह पुरुषप्रधान व्यवस्था के कारण है |इसलिए स्त्रियों को एकजुट होकर स्त्री के खल रूप के प्रचार-प्रसार को रोकना चाहिए|इस काम में वे पुरूष भी उनके साथ होंगे,जो परिवार-समाज के रिश्तों में लोकतंत्र के समर्थक हैं |
Thursday, 6 October 2011
इज्जत
शाम के धुंधलके में एक स्त्री तेजी से सुनसान गली को पार कर रही थी कि अचानक एक उचक्का चाकू लिए उसके सामने आ गया |बोला -'जो कुछ पास में है ,चुपचाप निकाल दो |'कहते हुए उसने स्त्री की देह पर नजर डाली |उसकी देह पर उतारने लायक कुछ ना था |हाँ,एक छोटे से बटुए को वह अपने ब्लाउज के अंदर छिपाए हुए थी |
'बटुआ निकालो -वह गरजा|
स्त्री ने कस कर अपने ब्लाउज को पकड़ लिया और गिड़गिड़ाई -इसे मैं नहीं दे सकती |कभी ,किसी हालत में नहीं |
उचक्के ने सारे दाव-पेंच आजमा डाले |जान ले लेने से लेकर तेज़ाब से चेहरा बिगाड़ देने की धमकी दी ,पर स्त्री टस से मस नहीं हुई |तब उसने सोचा -स्त्री को अपनी इज्जत से सबसे ज्यादा प्यार होता है,इसे खोकर वह जीना भी नहीं चाहती |
वह चेहरे पर क्रूर भाव लाकर हँसा-दे दो बटुआ ,वरना तुम्हारी इज्जत लूट लूँगा |
स्त्री नहीं डरी |उदासीन भाव से बोली -'लूट लो भैया |लूटी हुई इज्जत एक बार और लूट जाएगी,तो क्या फर्क पड़ेगा ?मैं तो वैसे भी मरी हुई हूँ |पर यह बटुआ नहीं दूंगी |इसमें जो रूपएं हैं, वह मेरे मर रहे बच्चे के इलाज के लिए हैं और इसे अपनी इज्जत बेच के लाई हूँ |'कहते हुए वह फफक पड़ी,उचक्के के हाथ से चाकू छूटकर गिर पड़ी |
'बटुआ निकालो -वह गरजा|
स्त्री ने कस कर अपने ब्लाउज को पकड़ लिया और गिड़गिड़ाई -इसे मैं नहीं दे सकती |कभी ,किसी हालत में नहीं |
उचक्के ने सारे दाव-पेंच आजमा डाले |जान ले लेने से लेकर तेज़ाब से चेहरा बिगाड़ देने की धमकी दी ,पर स्त्री टस से मस नहीं हुई |तब उसने सोचा -स्त्री को अपनी इज्जत से सबसे ज्यादा प्यार होता है,इसे खोकर वह जीना भी नहीं चाहती |
वह चेहरे पर क्रूर भाव लाकर हँसा-दे दो बटुआ ,वरना तुम्हारी इज्जत लूट लूँगा |
स्त्री नहीं डरी |उदासीन भाव से बोली -'लूट लो भैया |लूटी हुई इज्जत एक बार और लूट जाएगी,तो क्या फर्क पड़ेगा ?मैं तो वैसे भी मरी हुई हूँ |पर यह बटुआ नहीं दूंगी |इसमें जो रूपएं हैं, वह मेरे मर रहे बच्चे के इलाज के लिए हैं और इसे अपनी इज्जत बेच के लाई हूँ |'कहते हुए वह फफक पड़ी,उचक्के के हाथ से चाकू छूटकर गिर पड़ी |
जिगर
एक स्त्री-[ दूसरी से]चाहें कुछ भी हो जाए ,स्त्री को अपने सारे रहस्य मन के तहखाने में दफ़न रखना चाहिए |प्रेम के आवेग या विश्वास में पुरूष को नहीं बताना चाहिए,क्योंकि गुबार उतरते ही पुरूष स्त्री की कमजोरियों पर ताने कसने लगता है |उसका जीना मुहाल कर देता है ,परित्याग भी कर सकता है
दूसरी स्त्री -लेकिन अपने प्रिय से कोई बात छिपाना ,उसके साथ धोखा नहीं होगा क्या ?
पहली स्त्री -कदापि नहीं ,क्योंकि किसी भी पुरूष के पास इतना बड़ा जिगर नहीं होता कि स्त्री की फिसलन को क्षमा कर दे |ऐसा जिगर तो सिर्फ स्त्री के पास होता है |
दूसरी स्त्री -लेकिन अपने प्रिय से कोई बात छिपाना ,उसके साथ धोखा नहीं होगा क्या ?
पहली स्त्री -कदापि नहीं ,क्योंकि किसी भी पुरूष के पास इतना बड़ा जिगर नहीं होता कि स्त्री की फिसलन को क्षमा कर दे |ऐसा जिगर तो सिर्फ स्त्री के पास होता है |
देह
स्त्री -तुम अपनी ताकत से मेरी देह पर राज कर सकते हो,दिल-दिमाग पर नहीं |
पुरूष -दिल का क्या करना है?दिमाग होता नहीं स्त्री के पास |देह ही बहुत है |
पुरूष -दिल का क्या करना है?दिमाग होता नहीं स्त्री के पास |देह ही बहुत है |
Wednesday, 5 October 2011
'पुत्र बिना गति नहीं' की मानसिकता
पिछले वर्ष जब भक्त-जन मिट्टी की माँ दुर्गा की आरती कर रहे थे,एक बेटा अपनी माँ को जिन्दा जला रहा था| भीख मांगती बूढ़ी औरतों से पूछो तो बेटों के अत्याचार की अनगिनत कहानियां सुनने को मिल जाती हैं|बचपन में माँ से भी एक कहानी सुनी थी,जिसमें बेटे ने प्रेमिका को खुश करने के लिए माँ का कलेजा ही निकाल लिया था |परशुराम ने भी तो पिता के कहने पर अपनी माँ का सिर काट लिया था| रवना [सुप्रसिद्ध गणितज्ञ आर्यभट्ट की विदुषी पत्नी] की जीभ भी उसके पुत्र ने पिता की आज्ञा से काट ली थी,जिससे उसकी मौत हो गयी | ‘ना आना इस देश लाडो’ की अम्मा जी भी बौरा गयी हैं |जबर्दस्त सदमा लगा है उन्हें |जिस बेटे पर उन्हें नाज था ,उसी ने षड्यंत्र कर ना केवल उनकी सत्ता हथिया ली,बल्कि उन्हें घसीट कर घर से बाहर कर दिया|यह वही अम्मा जी हैं,जिन्होंने अपने गांव वीरपुर में कन्या जन्म का निषेध कर रखा था |कन्याएं जन्म लेते ही मार दी जाती थीं |यह नियम उन्होंने अपने घर पर भी लागू की थीं |अपनी बेटी के परित्याग व पोतियों को मृत्युदंड देने में भी वे एक पल की देरी नहीं करतीं |वे स्त्री विरोध में पूरी तरह से पुरूष मानसिकता का प्रतिनिधित्व करती थीं |समय के साथ वे थोड़ा बदलती हैं,पर उनके रोपे विष-बीज अब मजबूत वृक्ष बन चुके हैं |अब वे भी उसी शिकंजे में हैं |इस आपातकाल में उनके साथ वे ही स्त्रियाँ हैं,जिनपर उन्होंने अनगिनत अत्याचार किए थे |दो बहुएँ,पोते की गर्भवती बहू,दो पोतियाँ,एक बच्ची के साथ सिर्फ दो पुरुष हैं –एक पालित पुत्र, दूसरा पोता |इस कुनबे को उनकी बहुत चिंता है |वे उन्हें ठीक करना चाहते हैं |अम्मा जी का कमजोर रूप वे सहन नहीं कर पा रहे हैं |बहू सलाह देती है कि वे वर्षों पहले छोड़ चुके वीरपुर चलें ,तो शायद अम्माजी इस सदमे से बाहर आ जाएँ |
पर वीरपुर बदल चुका है |अम्माजी की गद्दी पर एक ऐसा दबंग आदमी काबिज हो चुका है,जो घोर पतित है |सारे बुरे कामों के साथ वह लड़कियों की खरीद-फरोख्त करता है |उसके गुण्डे दूसरे गांवों से लड़कियों को अगवा करके लाते हैं,जिनकी वीरपुर में बोली लगती है|वीरपुर में लड़कियों के जन्म न लेने देने की परम्परा के कारण लड़कियाँ नहीं हैं,इसलिए वीरपुर के मर्द अपना घर बसाने के लिए लड़कियाँ खरीदते हैं |दूसरे गांव के लोग वीरपुर में लड़की ब्याहना नहीं चाहते,क्योंकि वहाँ औरत सिर्फ मादा है |ऐसे वातावरण में पांच जवान स्त्रियों के साथ अम्माजी का वीरपुर आना [वह भी बौरही रूप में]समस्याओं को जन्म दे रहा है |गांव के मर्द अम्माजी का शासन भूल चुके हैं,उन्हें नए शासक का समर्थन मिला हुआ है |अम्माजी के घर की पाँचों स्त्रियाँ की इज्जत खतरे में है|गांव के मंदिर का पुजारी उन्हें मंदिर में छिपाए हुए है ,पर कब तक !उनके बाहर निकलने का रास्ता भी बंद है और राशन-पानी भी |कब तक वे हथियार नहीं डालेंगी ?निश्चित रूप से धारावाहिक माँ दुर्गा का चमत्कार दिखाएगा,जिससे अम्माजी फिर से शक्तिरूपा होकर अपने परिवार की रक्षा करेंगी |
पर मैं सिर्फ उस भविष्य की ओर संकेत करना चाहती हूँ,जो निरंतर तेजी से घटते कन्या-अनुपात के कारण होने की प्रतीक्षा में है |यदि इसी तरह कन्या-भ्रूणों को मारा जाता रहा,तो क्या कल यह देश वीरपुर में तब्दील नहीं हो जाएगा?निश्चित रूप से जब पुरूषों को स्त्री उपलब्ध नहीं होगा तो जो शक्तिशाली व संपन्न होगा,वही स्त्री को प्राप्त करेगा |ज्यादातर परिवारों में कई पुरुष एक स्त्री के साथ रहने को विवश होंगे |एक अराजक स्थिति होगी |स्त्री मात्र मादा होगी,वस्तु होगी |स्त्री के लिए युद्ध होंगे ,छीना-झपटी,बलात्कार में बढ़ोत्तरी होगी |समाज से नैतिकता पूरी तरह विलुप्त हो लाएगी |अभी समय है,हम चेत सकते हैं,संभल सकते हैं |पर कहाँ खुल रही है हमारीआँखें?प्रसिद्ध नर्सिंगहोमों के करीबी नालों में असंख्य कन्या-अस्थियों का मिलना क्या सिद्ध करता है ?कचरे,जंगल व वियावनों में [मरने के लिए फेंकी गयी ]बच्चियों को देखकर यही लगता है कि आज भी बेटियों से लोगों को कितनी नफरत है| ५ अक्टूबर दुर्गा नौमी- इस दिन अधिकतर हिन्दू परिवारों में नौ कन्याओं की पूजा-अर्चना की परम्परा है]गोरखपुरमें एक नर्सिंगहोम के पास से पांच माह की बच्ची का शव मिला है |बच्ची का शव अखबार में लिपटा हुआ था |ऐसी ना जाने कितनी बच्चियाँ इस तिथि को मिली होंगी |
समाज की मानसिकता इक्कीसवीं सदी में भी बेटियों के प्रति बदली नहीं है |वह बोझ है,पराया धन है |उसके पैदा होने से धरती धँस जाती है |आज भी स्त्रियाँ[विशेषकर अशिक्षित]पुत्र-मोह से ग्रस्त हैं | पुत्र के लिए कई व्रत रखती हैं[बेटी के लिए एक भी नहीं]| बेटे को दूध-मलाई खिलाती हैं,बेटी को रूखी-सूखी [धारणा कि बेटियां तो रूखी-सूखी खाकर भी ताड़ की तरह बढ़ जाती ] |बेटे का कैरियर महत्वपूर्ण मानती हैं,इसलिए अच्छे से अच्छा स्कूल,उच्च शिक्षा व खर्चीले संसाधन बेटे के लिए जुटाती हैं |बेटी के लिए तो बस शादी जरूरी है,इसलिए उसके लिए दहेज जुटाना ही पर्याप्त मानती हैं |मान्यता है कि लड़की तो जैसे चाहे,पढ़ ही लेगी |फिर उसकी शिक्षा भी तो बस उसे विवाह लायक बनाने के लिए है,कैरियर के लिए नहीं |कल पति नहीं चाहेगा,तो सब कुछ छोडना पड़ेगा,इसलिए ज्यादा खर्चा करना फिजूल है [हालाँकि शिक्षित व शहरी स्त्रियों की सोच अब काफी बदल चुकी है] मेरा एक शिक्षित मित्र चार बेटियों का पिता बनकर परेशान है|माँ की पोते की जिद ने उसे मजबूर कर दिया था |माँ तो रही नहीं और अब वह बच्चियों की शिक्षा और विवाह के खर्चे के बारे में सोच-सोचकर बीमार रहने लगा है |मैंने उसे बच्चियों की शादी की चिंता छोड़कर उन्हें अच्छी तरह शिक्षित करने का सुझाव दिया है,पर महंगी होती जा रही शिक्षा को देखकर मुझे भी चिंता हो रही है |आज के कठिन व महंगे समय में जहाँ किसी एक बच्चे की परवरिश ही मुश्किल है,वहाँ बेटे की प्रतीक्षा में बेटियों की लाईन लगाना या फिर भ्रूण का लिंग पता कर उसे नष्ट करवा देना या पैदा हो जाने के बाद मरने के लिए छोड़ देना या फिर बेच देना कहाँ की बुद्धिमानी है ?पर यह घटित हो रहा है ,जो चिंता का विषय है |समाज की मानसिकता जब तक नहीं बदलेगी ,लिंग-भेद जब तक नहीं मिटेगा ,तब तक इस समस्यां क समाधान नहीं हो सकेगा| यह प्रश्न उठ सकता है कि जब इतनी कन्याएँ पैदा हो रही हैं कि उन्हें मारने की जरूरत पड़ रही है,तो फिर बेटों के सापेक्ष बेटियों का अनुपात घट कैसे रहा है?पर यह हो रहा है ,क्योंकि ज्यादातर को बेटियां नहीं चाहिए ||कुछ लोगों का यह भी कहना है कि गरीबी इसका मुख्य कारण है |बढ़ती जाती दहेज की मांग के कारण माता-पिता बेटियों के साथ नाइंसाफी कर रहे हैं |उत्तर –प्रदेश की मुख्य मंत्री सुश्री मायावती जी ने इसी कारण से १५ जनवरी २००९ से महामाया गरीब बालिका आशीर्वाद योजना शुरू की ,जिसमें गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाले परिवारों में बालिका के जन्म होने पर एक मुश्त धनराशि १८ वर्ष के लिए राष्ट्रीय बैंक में सावधि जमा कर दी जाती है |१८ वर्ष की आयु तक बालिका के अविवाहित रहने की स्थिति में उक्त जमा धनराशि से लगभग एक लाख रूपये की धनराशि उपलब्ध होगी |अब तक ४२५७१५ बालिकाएं इस योजना से लाभान्वित हो चुकी हैं |[यह सरकारी आकड़ा है,इसका लाभ कितनों को,कितना और कैसे मिलता है यह अलग शोध का विषय है]
निश्चित रूप से समाज की मानसिकता बदले बिना बेटियों को सम्मान नहीं मिलेगा ,न उनकी हत्याएं रूकेंगी |शिक्षा का प्रसार,जागरण-अभियान,मीडिया के प्रयास और सरकारी कोशिशें,सख्त कानून सबकी जरूरत पड़ेगी |मीडिया को लड़कियों के प्रति होने वाली हिंसा,यौन-शोषण,बलात्कार की खबरों के साथ उन खबरों को भी छापने में दिलचस्पी दिखानी चाहिए,जिसमें बेटियों ने कीर्तिमान बनाएँ हैं|उसे उनकी उपलब्धियों,सफलताओं का अधिकतम प्रचार-प्रसार करना चाहिए |ऐसा करने का सकरात्मक प्रभाव पड़ेगा |लोग बेटियों की सुरक्षा के लिए चिंतित नहीं रहेंगे |बेटियां भी आत्मविश्वास से भरेंगी और आत्मनिर्भर बनेंगी |जल्द ही वह दिन आने वाला है ,जब बेटी के जन्म का स्वागत होगा और लिंग-भेद हमेशा के लिए समाज से मिट जाएगा |३अक्तूबर को पुरूषों के लिए सुरक्षित मानी जाने वाली भारतीय सेना में पहली बार एक महिला जवान को शामिल किया गया है |अब तक महिलाओं को सशस्त्र बलों में सिर्फ गैर लड़ाकू इकाइयों में अधिकारी के तौर पर शामिल किए जाने की अनुमति थी ,लेकिन दो बचों की माँ ,३५ वर्षीया सैपर शांति तिग्गा ने शारीरिक परीक्षण में अपने पुरूष समकक्षों को पीछे छोड़ दिया |उसे ९६९ रेलवे इंजीनियर रेजिमेंट आफ टेरिटोरियल आर्मी में शामिल किया गया है |कहने का तात्पर्य यह कि धीरे-धीरे बेटियां हर क्षेत्र पर काबिज हो रही हैं |वे न कमजोर हैं,न अक्षम,न पुरूषों से किसी बात में कम, इसलिए समाज को उनके प्रति अपनी सोच बदल देनी चाहिए |’ना आना लाडो’की अम्मा जी भी अपनी सोच बदलने को वाध्य हो रही हैं सरकार भी ‘बेटी बचाओ’अभियान को युद्ध-स्तर पर लागू करने के लिए कृतसंकल्प है,तो देर किस बात की है |आइए हम सब भी इस पवित्र यज्ञ में शामिल हों और ‘पुत्र बिना गति नहीं’की मानसिकता को बदलें |
उफ़ ये जाति!
जाति का दंश बचपन में मैंने भी झेला है|वैसे मैं जन्म से वर्णिक[बनिया]हूँ ,जो दलित जाति नहीं |पहले यह पिछड़ी जाति में भी शामिल नहीं थी,पर ब्राह्मणों के मुहल्ले में पीठ पीछे हमें 'छोट जतिया' जैसा संबोधन जरूर सुनने को मिल जाता था |विशेषकर ब्राह्मणियों द्वारा ,जो जन्मजात श्रेष्ठता की भावना से भरी रहती थीं |उनके जैसे कपड़े हम नहीं पहन सकते थे|पहन लिया,तो उनकी नकल मानी जाती थी |उनके घर जाते समय हमें सावधान रहना पड़ता था कि उनकी पवित्र वस्तुएँ छू न जाएँ |मुझे बहुत बुरा लगता था और मैं उनके घर कभी नहीं जाती थी |हाँ,एक बार एक घर में जरूर गयी थी ,जब उनके यहाँ पहली बार टीवी आया था |मेरे लिए वह अजूबा था ,पर उनकी झिड़की से आहत होकर मैंने अपने घर टीवी लाने के लिए माँ पर जोर डाला था |वे एक जूनियर इंजीनियर साहब थे ,पंडित थे, इसलिए उनकी पत्नी पंडिता थीं |किसी को अपने में नहीं लगाती थीं |उनकी बेटी राजकुमारी की तरह पल रही थी |उसकी हर बात निराली थी ,हम लोगों से हट कर थी |साधारण परिवार से होने के कारण न तो उसके जैसे कपड़े हमारे पास थे ,ना वैसा घर |थी भी वह बेहद गोरी और सुंदर |माँ उसकी खूब सराहना करती ,हर बात में उससे तुलना करती |माँ खुद जाति को मानती थी ,इसलिए पंडिताईन उनके लिए 'बड़े आदमी'थीं और हरिजन दाई माँ 'छोट आदमी'|पंडिताइन जैसा व्यवहार वे दाई माँ से करती थीं और वे भी इसे स्वाभाविक मानती थीं |पर मेरा बाल-मन इस भेद-भाव से सहमत नहीं होता था |वह राजकुमारी मेरे साथ पढ़ती थी और पढ़ाई में मुझसे तेज नहीं थी ,फिर कहाँ की राजकुमारी ?
पुरानी बात याद आने का एक कारण आज उपस्थित हुआ |एक दुकान पर एक ब्राह्मणी नौमी में कन्या पूजन का सामान खरीद रही थीं |बातों ही बातों में उन्होंने बताया कि -'ब्राह्मण कन्या के पूजन से ही पुन्य लाभ मिलता है ,चाहे एक ही कन्या हो |'मैंने कहा -कन्या में भी भेद ! दुर्गा क्या इस भेद-भाव से प्रसन्न होंगी ?तो वे पूरे आत्मविश्वास से बोलीं -देवी हमेशा ब्राह्मणों की पूजा से ही प्रसन्न होती हैं |किसी दूसरी जाति को देखा है कथा बांचते ,पूजा कराते |जो ऐसा करते हैं ,वे पाप के भागी होते हैं |मैं तो हमेशा ब्राह्मण कन्या को ही जिमाती हूँ ,और यही परम्परा हमारे खानदान में चलती है|'
मैं हतप्रभ हो उठी |'क्या तीस सालों में ये स्त्रियाँ जरा भी नहीं बदली हैं ?क्या इनके घरों के पुरूष भी नहीं बदले हैं ?क्या आज भी छोटी जाति के प्रति इनके मनों में वही पहले जैसी अकूत घृणा है ?कहीं दलित बच्चियों के साथ बलात्कार में यही घृणा तो काम नहीं कर रही ?पर कुछ तो जरूर बदला है ,जो आश्वस्त करता है |अखबार में खबर है कि -आज विश्व हिन्दू महासंघ महानगर [गोरखपुर]इकाई के तत्वाधान में दलित कुंवारी कन्याओं का नवदुर्गा रूप में पूजन शीतला माता के मंदिर पर होगा |पर कहीं न कहीं मन डरता भी है कि यह सिर्फ सियासी दिखावा ना हो ,क्योंकि अब तक जाति -पाति से लोगों की मानसिकता उबरी नहीं है |
पुरानी बात याद आने का एक कारण आज उपस्थित हुआ |एक दुकान पर एक ब्राह्मणी नौमी में कन्या पूजन का सामान खरीद रही थीं |बातों ही बातों में उन्होंने बताया कि -'ब्राह्मण कन्या के पूजन से ही पुन्य लाभ मिलता है ,चाहे एक ही कन्या हो |'मैंने कहा -कन्या में भी भेद ! दुर्गा क्या इस भेद-भाव से प्रसन्न होंगी ?तो वे पूरे आत्मविश्वास से बोलीं -देवी हमेशा ब्राह्मणों की पूजा से ही प्रसन्न होती हैं |किसी दूसरी जाति को देखा है कथा बांचते ,पूजा कराते |जो ऐसा करते हैं ,वे पाप के भागी होते हैं |मैं तो हमेशा ब्राह्मण कन्या को ही जिमाती हूँ ,और यही परम्परा हमारे खानदान में चलती है|'
मैं हतप्रभ हो उठी |'क्या तीस सालों में ये स्त्रियाँ जरा भी नहीं बदली हैं ?क्या इनके घरों के पुरूष भी नहीं बदले हैं ?क्या आज भी छोटी जाति के प्रति इनके मनों में वही पहले जैसी अकूत घृणा है ?कहीं दलित बच्चियों के साथ बलात्कार में यही घृणा तो काम नहीं कर रही ?पर कुछ तो जरूर बदला है ,जो आश्वस्त करता है |अखबार में खबर है कि -आज विश्व हिन्दू महासंघ महानगर [गोरखपुर]इकाई के तत्वाधान में दलित कुंवारी कन्याओं का नवदुर्गा रूप में पूजन शीतला माता के मंदिर पर होगा |पर कहीं न कहीं मन डरता भी है कि यह सिर्फ सियासी दिखावा ना हो ,क्योंकि अब तक जाति -पाति से लोगों की मानसिकता उबरी नहीं है |
Saturday, 1 October 2011
शक्तिपूजा की सार्थकता
शक्ति-पूजा यानी स्त्री-पूजा के दिन हैं |अच्छा लग रहा है कि कम से कम वर्ष के दस दिन तो पुरूष स्त्री के आगे नतमस्तक होता है'|पर उसके बाद ....३५५ दिन ....!.क्या स्त्री देवी रह जाती है ?रहे भी कैसे !खामोश जो नहीं रहती ,साकार जो हो जाती है ,खिलाफत जो करती है ,उनकी इच्छा के अनुसार आचरण जो नहीं करती |मिट्टी की देवी हो या पत्थर की ,उसे वे अपनी इच्छा से गढ़ते हैं ,जेवर-कपड़े पहनाते हैं,जो चाहते हैं,करते हैं और वह चुप रहती है ,इसीलिए तो पूजनीय है|बिगड़ी हुई स्त्री का पुरूष क्या करे ?
आप तो जानते ही होंगे कि शक्ति का उदभव पुरूष-देवों के सम्मलित तेज से हुआ था,किसी देवी का तेज उसमें शामिल नहीं था|शिव के तेज से शक्ति का मुख ,यमराज से माथा व केश ,विष्णु से भुजाएं ,चन्द्रमा से वक्ष ,इंद्र से कमर ,ब्रह्मा से चरण ,सूर्य से पैरों की अंगुलियाँ प्रजापति से दांत ,अग्नि से तेज ,वायु से कान तथा अन्य देवताओं के तेज से अलग-अलग अंग बने [अपवाद स्वरूप इनमें तीन देवियाँ शामिल हैं ,पर उनका पर्याय भी पुलिंग है ] शक्ति पुरूषों द्वारा गढ़ी गयी है ,इसलिए उसे पूजा जाता है |अपनी रक्षा करवाई जाती है और काम निकलते ही विदा कर दिया जाता है ,फिर शुरू हो जाता है स्त्री -हिंसा का दौर |वैसे कुछ बड़े मर्द [?]दस दिन भी सब्र नहीं कर पाते |उदाहरण देखिए -३०सितम्बर को गोरखपुर में ही[ऐसी घटनाएं दुसरे स्थानों पर भी हुई होगी] नौ वर्ष की बालिका से दुराचार हुआ |दहेज की मांग को लेकर एक गर्भवती को इतना पीटा गया कि उसकी हालत गम्भीर है, पिता ने उसे जिला महिला अस्पताल में भरती कराया है|[ज्यादा बताकर उन भक्तों का मन खराब नहीं करना चाहती,जो सच्चे मन से पूजा-व्रत कर रहे हैं,यह टिप्पणी उनके लिए है भी नहीं] इसी शक्ति-पूजा के दिन एक बेटे ने अपनी ही माँ को जिन्दा फूंक दिया था |एक ने बाकायदा सुपारी देकर माँ को बुरी तरह तड़पाकर मरवाया[माँ ने उसकी आवारगी के कारण पिता को रूपये देने से मना कर दिया था ,इसलिए सबसे पहले उसने माँ की वह जीभ कटवाई ,जिससे मना किया था] बूढ़ी माँ को सड़क,जंगल व वृद्धाश्रमों में पटक आने वाले,या घर में ही अपमानित व प्रताड़ित करने वाले बेटों की शक्ति पूजक इस देश में कमी नहीं है |
क्या स्त्री का सम्मान न करने वालों से स्त्री रूपा शक्ति प्रसन्न हो सकती है ?कदापि नहीं|तो आओ मित्रों,स्त्री के प्रति सम्मान भाव जगाने के लिए सामंती मानसिकता बदलें ,स्त्री-हिंसा समाप्त करने का संकल्प लें |ऐसा करने से ही शक्ति प्रसन्न होंगी,और यह समाज-संसार सुखी होगा |
आप तो जानते ही होंगे कि शक्ति का उदभव पुरूष-देवों के सम्मलित तेज से हुआ था,किसी देवी का तेज उसमें शामिल नहीं था|शिव के तेज से शक्ति का मुख ,यमराज से माथा व केश ,विष्णु से भुजाएं ,चन्द्रमा से वक्ष ,इंद्र से कमर ,ब्रह्मा से चरण ,सूर्य से पैरों की अंगुलियाँ प्रजापति से दांत ,अग्नि से तेज ,वायु से कान तथा अन्य देवताओं के तेज से अलग-अलग अंग बने [अपवाद स्वरूप इनमें तीन देवियाँ शामिल हैं ,पर उनका पर्याय भी पुलिंग है ] शक्ति पुरूषों द्वारा गढ़ी गयी है ,इसलिए उसे पूजा जाता है |अपनी रक्षा करवाई जाती है और काम निकलते ही विदा कर दिया जाता है ,फिर शुरू हो जाता है स्त्री -हिंसा का दौर |वैसे कुछ बड़े मर्द [?]दस दिन भी सब्र नहीं कर पाते |उदाहरण देखिए -३०सितम्बर को गोरखपुर में ही[ऐसी घटनाएं दुसरे स्थानों पर भी हुई होगी] नौ वर्ष की बालिका से दुराचार हुआ |दहेज की मांग को लेकर एक गर्भवती को इतना पीटा गया कि उसकी हालत गम्भीर है, पिता ने उसे जिला महिला अस्पताल में भरती कराया है|[ज्यादा बताकर उन भक्तों का मन खराब नहीं करना चाहती,जो सच्चे मन से पूजा-व्रत कर रहे हैं,यह टिप्पणी उनके लिए है भी नहीं] इसी शक्ति-पूजा के दिन एक बेटे ने अपनी ही माँ को जिन्दा फूंक दिया था |एक ने बाकायदा सुपारी देकर माँ को बुरी तरह तड़पाकर मरवाया[माँ ने उसकी आवारगी के कारण पिता को रूपये देने से मना कर दिया था ,इसलिए सबसे पहले उसने माँ की वह जीभ कटवाई ,जिससे मना किया था] बूढ़ी माँ को सड़क,जंगल व वृद्धाश्रमों में पटक आने वाले,या घर में ही अपमानित व प्रताड़ित करने वाले बेटों की शक्ति पूजक इस देश में कमी नहीं है |
क्या स्त्री का सम्मान न करने वालों से स्त्री रूपा शक्ति प्रसन्न हो सकती है ?कदापि नहीं|तो आओ मित्रों,स्त्री के प्रति सम्मान भाव जगाने के लिए सामंती मानसिकता बदलें ,स्त्री-हिंसा समाप्त करने का संकल्प लें |ऐसा करने से ही शक्ति प्रसन्न होंगी,और यह समाज-संसार सुखी होगा |
काश ऐसा होता
आज फिर अखबार में खबर है कि 'एक माँ ऐसी भी...|' कारण -दो बच्चे लावारिस मिले हैं |इधर लगातार' डायन माँ ने ...,हवस की मारी माँ ने ....अपने बच्चे को मरने के लिए छोड़ दिया |' ऐसी खबरें पढ़ने को मिलीं|ये खबरें मुझे विचलित करती हैं |क्या आज भी स्त्री उतनी ही मजबूर ,कमजोर और बेवकूफ है ,जितनी पहले हुआ करती थीं ?कुंती ने कर्ण,विधवा ब्राह्मणी ने कबीर और ऐसी ही अनगिनत माओं ने अपनी संतान का परित्याग क्या खुशी से किया होगा ?क्या संतान उन्होंने खुद गढ़ कर अपनी कोख में डाल लिया होगा ?क्या पूरे नौ महीने अपनी कोख में रखते और असीम पीड़ा सहकर जन्म देते समय वे डायन ,कठकरेज ,निर्मम ना थीं ?फिर क्यों वे अपनी संतान को त्यागने पर मजबूर हुईं ?कहाँ था उस समय वह पुरूष ,जिसने स्त्री की कोख को हरा किया था? क्यों नहीं समाज ऐसे बच्चों को सम्मानजनक स्थान देता है ?क्यों नहीं ऐसी स्त्री को चरित्रवान समझा जाता है ?उसे मनुष्य की तरह जीने दिया जाता है ?
आज जब कि परिवार नियोजन के साधन आसानी से उपलब्ध हैं ,क्योंकर स्त्री गर्भवती हुई ?निश्चित रूप से वह प्रेम के विश्वास में मारी गयी होगी ,या फिर इस काबिल ना होगी कि बच्चे को पाल सके |ऐसी स्त्रियों को गा ली देने वालों को अपने गिरेवान में भी झाँक कर देखना चाहिए |भरे पेट अय्याशी करने वाले क्या जाने अभाव की पीड़ा ?क्या जाने भूख ?स्त्री होने की लाचारी ?चलिए मान लिया देह की भूख के कारण स्त्री ने संबंध बनाए थे ,जिसका परिणाम गर्भ हुआ |तो क्या यह भूख सिर्फ उसे लगी?बड़े-बड़े महात्मा ,देवता काम के वशीभूत हुए |स्त्री भोली होगी ,वरना समझदार स्त्री फंसने वाला काम भला क्यों करती ?मेरे शहर में एक गंदी सी पगली है ,वह अब तक दो बार माँ बन चुकी |संभ्रांतों के इस शहर में कोई तो उसके बच्चों का पिता होगा|काश ,स्त्री के पास उपजाऊ कोख ना होती ,तो जाने कितने महापुरुषों का पाप आकार न लेता और स्त्री को गरियाने का मौका समाज के हाथ से निकल जाता |
आज जब कि परिवार नियोजन के साधन आसानी से उपलब्ध हैं ,क्योंकर स्त्री गर्भवती हुई ?निश्चित रूप से वह प्रेम के विश्वास में मारी गयी होगी ,या फिर इस काबिल ना होगी कि बच्चे को पाल सके |ऐसी स्त्रियों को गा ली देने वालों को अपने गिरेवान में भी झाँक कर देखना चाहिए |भरे पेट अय्याशी करने वाले क्या जाने अभाव की पीड़ा ?क्या जाने भूख ?स्त्री होने की लाचारी ?चलिए मान लिया देह की भूख के कारण स्त्री ने संबंध बनाए थे ,जिसका परिणाम गर्भ हुआ |तो क्या यह भूख सिर्फ उसे लगी?बड़े-बड़े महात्मा ,देवता काम के वशीभूत हुए |स्त्री भोली होगी ,वरना समझदार स्त्री फंसने वाला काम भला क्यों करती ?मेरे शहर में एक गंदी सी पगली है ,वह अब तक दो बार माँ बन चुकी |संभ्रांतों के इस शहर में कोई तो उसके बच्चों का पिता होगा|काश ,स्त्री के पास उपजाऊ कोख ना होती ,तो जाने कितने महापुरुषों का पाप आकार न लेता और स्त्री को गरियाने का मौका समाज के हाथ से निकल जाता |
Subscribe to:
Posts (Atom)